दिल्ली में माननीयों की नैतिकता!

d1दिल्ली ने कहा दिल से आड-इवन फिर से लेकिन इस पर हमारे माननीयों की सोच एक दम उलट है। संसद के दूसरे सत्र में भाग लेने दिल्ली पहुंचे सांसदों ने आड-इवन नियमों की धज्जियां उड़ायीं। इस होड़ में एक दूसरे से लोग आगे निकलते दिखे। हालांकि कुछ ने अभियान को बल देने के लिए नैतिकता का परिचय दिया। वालीवुड के ऐसे सांसद भी हैं जिनकी नैतिकता रूपहले पर्दे पर एक नायक की दिखती है लेकिन रील लाइफ से हट कर रीयल लाइफ में यह बिल्कुल विपरीत व्यवहार करते दिखे। तमाम सांसदों ने संसद पहुंचने के लिए दिल्ली सरकार की डीटीसी की एसी बसों और फेरी सुविधा का लाभ नहीं लिया। एक जिम्मेदार और जवाबदेह नागरिक होने का परिचय देने के बजाय अपनी राजनीतिक हैसियत और रुतबे की दबंग छबि पेश की। दिल्ली में प्रदूषण को कम करने के लिए अपनाए गए सरकार के नियमों को जमीन दिखायी। उनकी तरफ से यह गुस्ताखी क्यों की गयी यह बात समझ में नहीं आयी, लेकिन यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसकी जवाबदेही से बिल्कुल उलट है। माननीयों का यह व्यवहार असंसदीय है। हालांकि भाजपा सांसद परेशरावल ने ट्यूट कर दिल्ली की जनता और केजरीवाल से अपनी गलती पर माफी मांगी लेकिन यह सूची केवल परेशरावल तक सीमित नहीं होती है।
दिल्ली में उस दिन आड की पारी थी लेकिन सांसदों ने इवन वाहनों का प्रयोग किया। अपनी तीखी जुबानों से मीडिया की सुर्खियों में रहने वाले सांसद ओवैसी ने एक अलग मिसाल पेश की। दूसरों से तो वे भले निकले। डीटीसी बस और फेरी सुविधा का इस्तेमाल करने के बजाय ओवैसी ने संसद तक पैदल यात्रा की, जबकि उत्तर प्रदेश से भाजपा सांसद और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने खुले आम इस नियम की धज्जियां उड़ायीं। जिन पर भाजपा को बड़ा नाज है उन्हीं ने आड-इवन की ऐसी तैसी कर डाली। जबकि पीएम मोदी के गृहराज्य बड़ोदरा से निर्वाचित महिला सांसद रंजन भट्ट डीटीसी बस सुविधा का लाभ लेकर संसद पहुंचीं। वैसे कई सांसद साइकिल से संसद के दूसरे बजट सत्र में भाग लेने पहुंचे। हालांकि सांसदों ने यह भी आरोप लगाया कि डीटीसी की बसें समय से वहां उपलब्ध नहीं थीं। हमारे माननीयों का आचरण दुखद है। दूसरी तरफ यह दलील दी गयी कि सांसदों को इस सुविधा से छूट नहीं दी गयी हैं जबकि मंत्रियों को आड-इवन की झंझट से छूट है। दिल्ली सरकार ने यह नियम स्वयं के लिए नहीं बनाया है। दिल्ली देश की धडक़न हैं लेकिन दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में इसका शुमार है। कम से कम सांसदों को इस का खयाल रखना चाहिए था। जनहित और देश के लिए अपने रुतबे और अहमियत को अलग रखा जा सकता था। जबकि संसद के महत्वपूर्ण सत्र को देखते हुए दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने सिर्फ सांसदों के लिए छह एसी बसों का संचालन किया है। दूसरी सुविधाएं भी उपलब्ध करायी हैं। फिर इसका उपयोग क्यों नहीं किया गया। इसके पीछे कहीं न कहीं से राजनीतिक अहम भी दिखता है। क्योंकि केंद्र में जहां भाजपा की सरकार है, वहीं राज्य में केजरी की सरकार है। ऐसी स्थिति में कहीं न कहीं से राजनीति दुराव की स्थिति बनती है। क्योंकि नियम तोडऩे वालों में भाजपा की चर्चित
हस्तियां केशव प्रसाद मौर्य और परेशरावल जैसे लोग शामिल हैं। दिल्ली में ५६ लाख से अधिक दुपहिया वाहन पंजीकृत हैं।
प्रदूषण में इनकी भागीदारी ३० फीसदी है जबकि कारों से सिर्फ २० फीसदी प्रदूषण फैलता है। दिल्ली के प्रदूषण में ३० फीसदी हिस्सेदारी दुपहिया वाहनों की है ? विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के २० प्रदूषित शहरों में १३ भारतीय शहरों को रखा है, जिसमें दिल्ली चार प्रमुख शहरों में शामिल है। दिल्ली में ८५ लाख से अधिक गाडिय़ां हर रोज सडक़ों पर दौड़ती हैं जबकि इसमें १४०० नयी कारें शामिल होती हैं। दिल्ली में निर्माण कार्यों और इंडस्ट्री से भी भारी प्रदूषण फैल रहा है।
हालांकि इसकी मात्रा ३० फीसदी है जबकि वाहनों से होने वाला प्रदूषण ७० फीसदी है। शहर की आबादी हर साल चार लाख बढ़ जाती है, जिसमें तीन लाख लोग दूसरे राज्यों से आते हैं। आबादी का आंकड़ा १ करोड़ ६० लाख से अधिक हो चला है। सरकार का दावा है कि ८१ फीसदी लोगों ने आड इवन फार्मूले को दोबारा लागू करने की बात कही है। सर्वे में ६३ फीसदी लोगों ने इसे अनवरत लागू करने की सहमति दी है। वहीं ९२ फीसदी लोगों का कहना था कि वे दूसरी कार नहीं खरीदेंगे। इस सर्वे से यही लगता है कि पूरा शहर सरकार के साथ खड़ा हैं। लेकिन हमारे माननीय क्यों नहीं ? हमारी नीतियां हाथी दांत सी हैं। करना कम दिखाना अधिक। जिसका नतीजा है कि समस्याएं दिन ब दिन बढ़ती जा रही हैं। दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए केजरीवाल सरकार ने आड इवन फार्मूला लागू किया है। इसके पहले यह पहली जनवरी से १५ जनवरी तक चला था लेकिन सवाल उठता है कि इतनी कसरत के बाद भी दिल्ली में प्रदूषण का लेवल कम क्यों नहीं हुआ। इसके पीछे आखिर मुख्य वजह क्या है। शोध के बाद यह बात सामने आयी है कि दिल्ली में चौपाए वाहनों से अधिक दुपहिया वाहनों से प्रदूषण फैल रहा है, जबकि सरकार ने आड इवन अभियान में दुपहिया वाहनों और महिलाओं को खुली छूट दे रखी है यानी दुपहिया वाहन चालकों पर यह नियम नहीं लागू होगा। इसके पीछे सरकार का तर्क है कि सार्वजनिक यातायात प्रभावित न हो इसलिए ऐसा किया जा रहा है। क्योंकि सार्वजनिक यातायात प्रणाली को नियंत्रित करने के लिए सरकार के पास उतनी सुविधाएं अभी उपलब्ध नहीं है। सरकार का तर्क अपनी जगह ठीक हो सकता है। क्योंकि वह चुनी हुई सरकार है आम लोगों की सुविधाओं का खयाल रखना उसका नैतिक दायित्व भी बनता है। लेकिन उसका निदान फिलहाल हमारे पास उपलब्ध नहीं है। क्योंकि हम देश को राजनीतिक नारों और उपलब्धियों से सुधारने की कोशिश करते हैं। हम जमीनी हकीकत को दबा नहीं सकते हैं।
आज दुनिया भर में बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण हमारे लिए बड़ी चुनौती बन गया है। आने वाला वक्त और दुरुह और चुनौती भरा होगा। कम से कम हमारे माननीय सांसदों को यह बात सोचनी ही चाहिए। (हिफी)

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