आंखों पर इस वजह से भी चश्मे से ज्यादा भाता है लैंस, जानें फायदे के साथ नुकसान

कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीन के साथ निरंतर संपर्क में रहने के कारण चश्मे और कॉन्टैक्ट लेंस का इस्तेमाल करने वालों की तादाद तेज़ी से बढ़ती जा रही है। फिर भी उन्हें इनके चुनाव और इस्तेमाल का सही तरीका मालूम नहीं होता। आजकल हर आयु वर्ग के लोग दृष्टि संबंधी समस्याओं से परेशान रहते हैं। इसलिए चश्मे और कॉन्टेक्ट लेंस पर लोगों की निर्भरता बढ़ती जा रही है। इसके अलावा चश्मे से छुटकारा पाने के लिए लोग लेज़र ट्रीटमेंट के बारे में भी जानने को इच्छुक होते हैं। यहां दिल्ली स्थित सर गंगाराम हॉस्पिटल की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ.अकीदा लाल बता रही है कि हमें अपनी आंखों के साथ चश्मे और कॉन्टैक्ट लेंस की देखभाल कैसे करनी चाहिए।

लैंस

नज़र से जुड़ी समस्याएं

मायोपिया : स्वस्थ आंखों में किसी वस्तु की इमेज रेटिना पर बनती है। मायोपिया में यह छवि रेटिना से पहले बन जाती है तो धुंधला दिखाई देने लगता है। इसके लिए कॉन्केव या माइनस नंबर का लेंस दिया जाता है।

हाइपरमेट्रोपिया : जब किसी वस्तु की इमेज रेटिना के ऊपर न बनकर उसके पीछे बनती है तो उसे हाइपरमेट्रोपिया कहते हैं। इससे पास की चीज़ देखने में परेशानी होती है। इस समस्या को दूर करने के लिए प्लस पावर वाले कॉन्वेक्स लेंस की ज़रूरत होती है।

एस्टिग्मेटिज़्म : यह वैसी स्थिति है, जिसमें आंखों का कॉर्निया पूरी तरह गोल नहीं होता। इससे रेटिना पर पडऩे वाली लाइट किसी एक जगह टिकने के बजाय आसपास फैल जाती है। इससे दूर या पास, दोनों जगह पर धुंधला दिखाई देता है। साथ ही सिरदर्द भी हो सकता है। ऐसी समस्या होने पर सिलिंड्रिकल लेंस का इस्तेमाल किया जाता है।

प्रेस्बायोपिया : आमतौर पर 40 साल की उम्र के बाद लोगों को नज़दीक की चीज़ें देखने में परेशानी होती है। ऐसी समस्या को दूर करने के लिए चश्मे में कॉन्वेक्स या प्लस नंबर का लेंस यूज किया जाता है।

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कैसा हो चश्मा

  • फ्रेम हल्का हो, नाक और कान पर अधिक दबाव न डालता हो। उसकी फिटिंग भी अच्छी होनी चाहिए।
  • चश्मे को पहनते और उतारते वक्त दोनों हाथों का इस्तेमाल करना चाहिए।
  • चश्मे के लिए रेजि़न लेंस हलके होते हैं पर आसानी से टूटते नहीं हैं और इन पर खरोंच भी नहीं पड़ती।
  • प्लास्टिक लेंस भी हल्के होते हैं और आसानी से टूटते नहीं हैं लेकिन इन पर खरोंच जल्दी पड़ जाती है।
  • ट्रिप्लेक्स लेंस भी वज़न में हल्के होते हैं और जल्दी टूटते नहीं हैं।
  • लेंस पर कई तरह की कोटिंग भी मिलती है, जैसे कि एंटी-ग्लेयर, एंटी-स्क्रैच, फोटोक्रोमिक आदि। एंटी-ग्लेयर कोटिंग आंखों को चमक और फोटोक्रोमिक अल्ट्रावॉयलेट किरणों से बचाती है। डॉक्टर जब चश्मा लगाने की सलाह दें तो लेंस के बारे में पूरी जानकारी लें।
  • बच्चों और खिलाडिय़ों के लिए पॉलीकार्बोनेट ग्लास उपयुक्त होते हैं क्योंकि मज़बूत होने के साथ ये आंखों को सूरज की अल्ट्रावॉयलेट किरणों से भी बचाते हैं।
  • फील्ड वर्क करने वालों के लिए फोटोक्रोमिक ग्लास भी उपयोगी है क्योंकि सूरज की रोशनी में इसका रंग बदल जाता है और सनग्लास की ज़रूरत नहीं पड़ती।
  • आमतौर पर खेलने या ड्राइविंग के दौरान पोलराइज़्ड सनग्लासेज इस्तेमाल किए जाते हैं और धूप के तेज़ रिफ्लेक्शन से आंखों को बचाते हैं।

कॉन्टैक्ट लेंस का चुनाव

जिनकी दूर की नज़र कमज़ोर होती है और जिन्हें चश्मा पहनना नापसंद है, उनके लिए कॉन्टैक्ट लेंस सही विकल्प साबित होता है। अगर आंखों में ड्राईनेस की समस्या है तो सॉफ्ट कॉन्टैक्ट लेंस का चुनाव करना चाहिए। ये प्लास्टिक के बने होते हैं। आरामदायक होने के साथ कॉर्निया तक ऑक्सीजन पहुंचाने में भी मददगार होते हैं। इसकी कमी से कॉर्निया में सूजन आ सकती है। ऐसे लेंस को महीने भर बाद बदल देना चाहिए।

 

 

 

आरजीपी लेंस

  • इसका पूरा नाम रिजिड गैस परमिएबल लेंस है। ये थोड़े सख़्त होते हैं। इनमें विज़न अधिक साफ होता है। इनकी देखभाल भी आसान होती है। जिनकी दृष्टि ज्य़ादा कमज़ोर हो या जो लोग अधिक व्यस्त रहते हैं, उनके लिए ऐसे लेंस उपयुक्त होते हैं।
  • जिन्हें नज़र के धुंधलेपन के साथ सिरदर्द जैसी समस्याएं हों, उनके लिए टोरिक लेंस उपयुक्त रहता है।
  • जिनकी कॉर्निया सही शेप में नहीं होती या चश्मे का पावर अधिक हो तो उनके लिए सेमी टॉक्स लेंस बेहतर विकल्प हैं।

इसके साइड इफेक्ट

एलर्जी : सही तरीके से कॉन्टैक्ट लेंस नहीं लगाने पर आंखें लाल हो सकती हैं। साथ ही, खुजली की भी समस्या हो सकती है। ऐसे लक्षण दिखने पर लेंस न लगाएं और डॉक्टर की सलाह लें।

कॉर्निया पर खरोंच : लेंस पहनते और उतारते समय ध्यान रखें कि कॉर्निया पर कोई खरोंच न लगे। ऐसा होने पर कॉर्नियल अल्सर होने और आंख की पुतली पर सफेदी पडऩे का डर रहता है।

क्या है हन्ना लेज़र ट्रीटमेंट

अगर आप चश्मे या लेंस से छुटकारा पाना चाहते हैं तो उसके लिए लेसिक लेज़र ट्रीटमेंट बहुत उपयोगी साबित होता है। इस सर्जरी में बहुत कम समय लगता है और मरीज़ उसी दिन घर जा सकता है। लेसिक लेज़र की मदद से कॉर्निया की सतह को बदल दिया जाता है। इससे चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस के बिना भी सा$फ दिखने लगता है।

लेज़र के प्रकार

सिंपल लेसिक लेजर : इसमें कट लगाकर कॉर्निया को री-शेप किया जाता है। पूरी प्रक्रिया में करीब 20-25 मिनट लगते हैं। हालांकि इस तरह की सर्जरी का चलन अब कम होता जा रहा है।

ई-लेसिक लेज़र: इसका प्रोसेस लगभग सिंपल लेसिक लेज़र जैसा ही है। अंतर सि$र्फ मशीन का होता है। इस प्रोसेस से मरीज़ की आंखें जल्दी ही दुरुस्त हो जाती हैं।

कस्टमाइज़्ड लेसिक लेज़र : इसे सी-लेसिक लेज़र भी कहा जाता है। इसमें आंखों के साइज के हिसाब से ट्रीटमेंट किया जाता है। यह तरीका सबसे सुरक्षित है।

सर्जरी के बाद

  • ऑपरेशन के बाद दो-तीन दिन तक आराम करें। आंखों पर ज़्यादा जोर देने वाली एक्टिविटीज़ मसलन टीवी देखना, कंप्यूटर पर काम करना या पढऩा जैसे काम 15-20 दिनों तक न करें। इसके बाद चश्मे या लेंस से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा।
  • स्विमिंग और मेकअप आदि से कुछ सप्ताह तक दूर रहें।

कब बदलें इसे

डॉक्टरों के अनुसार लेंस को एक से 6 महीने के बीच चेकअप और डॉक्टर की सलाह के बाद बदलते रहना चाहिए। अगर लेंस लगाने के बाद आंखों में कोई तकलीफ तो बिना देर किए डॉक्टर से सलाह लें। इसके साथ ही कुछ लेंस ऐसे भी होते हैं, जिन्हें एक साल तक आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।

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