साध्वियां बनी अनुसूचित जाति की मैना-जाह्वनी, लिया परंपराओं को पालन करने का संकल्प

कुंभ पर्व के प्रथम शाही स्नान से पहले पंचदशनाम जूना अखाड़े के तहत अनुसूचित जाति के पहले महामंडलेश्वर बने कन्हैया प्रभुनंद गिरि ने अपने कुनबे का विस्तार किया है। अपनी ही तरह अनुसूचित जाति के लोगों को सनातन धर्म की दिशा और परंपरा से जोड़ते हुए उन्होंने अपने पांच शिष्यों को दीक्षा देकर साधु और साध्वी बनाया है।

Kumbh 2019ः

महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद गिरि से दीक्षा लेकर साध्वी बनने वालों में चंडीगढ़ की जाह्वनी उर्फ भैरवीनंद गिरि और आजमगढ़ की मैना देवी कश्यप उर्फ मैनानंद गिरि शामिल हैं। इसी तरह आजमगढ़ से लालचंद्र उर्फ रुद्रानंद गिरि, प्रयागराज से प्रेमचंद्र उर्फ प्रेमानंद गिरि और जौनपुर से रामसमुझ उर्फ रामानंद गिरि साधु बने हैं।

सभी पांचों को गंगाजल लेकर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सनातन धर्म से जुड़ने, इसका प्रचार-प्रसार करने और आजीवन इसकी रीति, नीति, परंपराओं का पालन करने का संकल्प दिलाया गया। साथ ही सभी ने धर्म सेवा, संत सेवा, समाज सेवा का व्रत भी लिया।

बता दें, महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद गिरि को कामाख्या पीठाधीश्वर और जूना अखाड़े के जगद्गुरु पंचानंद गिरि ने आरंभिक दीक्षा दी थी। इसी क्रम में अनुसूचित जाति से ही कानपुर के प्रज्ञानंद गिरि और पंचकूला के अशोकानंद गिरि का भी जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने महामंडलेश्वर पद पर पट्टाभिषेक किया था। जूना पहले ही कह चुका है कि सृष्टि में केवल ढाई जातियां ही हैं, नर, नारी और किन्नर। इसके अतिरिक्त कोई अन्य जाति नहीं। ऐसे में जाति बंधन बेमानी है।

साध्वी बनीं भैरवी नंद गिरि को अपने मूल माता-पिता का पता नहीं। आंखें खुली तो दूसरे माता-पिता पाया, लेकिन उन्होंने कभी मन से अपनाया नहीं। न शिक्षा-दीक्षा पर ध्यान दिया और न ही स्वास्थ्य पर। ब्रेन ट्यूमर ने अलग घेर रखा था। ऐसे में एक दिन आत्महत्या करने जा रही कि पास से गुजरते गुरु ने रोककर कारण पूछा और फिर आश्रम ले आए। आगे बारहवीं तक की पढ़ाई कराई। साथ ही ब्रेन ट्यूमर का इलाज भी। भैरवी बोलीं, अब आश्रम से जुड़कर अच्छा लग रहा है। समाज सेवा के अवसर मिले हैं। सनातन धर्म में सम्मान मिलना मेरे लिए और भी बहुत सुखद है।

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साध्वी मैना नंदगिरि बनीं आजमगढ़ की मैना देवी कश्यप का परिवार भी खेती-बारी से जुड़ा है। मैना ने एमए तक की शिक्षा हासिल करने के बाद बीएड भी किया। लगातार विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के आवेदन करती और परीक्षाएं देती रहीं पर क हीं भी सफलता हाथ नहीं लगी। गहरी निराशा और आगे की राह न सूझने के दौरान एक दिन आजमगढ़ के लालगंज आश्रम पर ही गुरु कन्हैया प्रभु नंद से भेंट हुई और वहीं सनानत धर्म से जुड़ने का संकल्प ले लिया। कहती हैं, सनातन धर्म से जुड़कर समाज एवं शिक्षा के लिए काम करना सुखद है, लगता है जीवन सार्थक हो गया।

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