उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों की हुंकार: 500 रुपये प्रति क्विंटल की मांग, चीनी मिलों की दलीलें और 2027 का सियासी चक्रव्यूह

लखनऊ के डालीबाग में आयोजित किसान मजदूर महापंचायत ने उत्तर प्रदेश की कृषि राजनीति में एक नया उबाल ला दिया है। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत के नेतृत्व में प्रदेश भर से जुटे गन्ना किसानों ने राज्य सरकार और चीनी मिल मालिकों पर अपना दबाव काफी बढ़ा दिया है।

आगामी पेराई सत्र के लिए किसानों की सबसे प्रमुख मांग गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) बढ़ाकर कम से कम 500 रुपये प्रति क्विंटल करने की है। इसके साथ ही, पिछले बकाये का तुरंत भुगतान और भुगतान में देरी होने पर कानूनी रूप से ब्याज देने की मांग ने भी जोर पकड़ लिया है। किसानों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सरकार जल्द ही कोई ठोस और सकारात्मक कदम नहीं उठाती है, तो समूचे प्रदेश के जिला मुख्यालयों पर धरने और मार्च निकालकर इस आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।

किसानों के इस आक्रोश और मूल्य वृद्धि की मांग के मूल में खेती की लगातार बढ़ती लागत है। मौजूदा समय में खाद, उत्तम किस्म के बीज, खेत की प्रारंभिक तैयारी और निराई-गुड़ाई जैसे कृषि कार्यों पर होने वाले खर्च में बेतहाशा वृद्धि हुई है। आंकड़ों के अनुसार, इस सत्र में गन्ने की औसत उत्पादन लागत में प्रति हेक्टेयर लगभग 10,477 रुपये का भारी इजाफा देखने को मिला है।

किसानों का तर्क बेहद स्पष्ट और बाजार के गणित पर आधारित है कि जब खुले बाजार में चीनी की कीमतें 4,000 रुपये से उछलकर 6,000 रुपये प्रति क्विंटल के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई हैं, तो इस मुनाफे का सीधा और उचित लाभ अन्नदाता को भी मिलना चाहिए। पिछले सत्र में सरकार द्वारा तय किया गया 400 रुपये प्रति क्विंटल का अधिकतम मूल्य मौजूदा महंगाई और लगातार बढ़ते उत्पादन खर्चों के सामने पूरी तरह नाकाफी साबित हो रहा है।

दूसरी तरफ, चीनी मिल मालिक भी अपनी आर्थिक विवशताओं और बढ़ते परिचालन खर्चों का हवाला देते हुए गन्ना मूल्य में किसी भी प्रकार की वृद्धि का कड़ा विरोध कर रहे हैं। मिल संचालकों के गणित के अनुसार, एक क्विंटल चीनी के उत्पादन में औसतन नौ क्विंटल गन्ने की खपत होती है। गन्ने की खरीद, ढुलाई, कर्मचारियों के भारी-भरकम वेतन और पूरी प्रसंस्करण प्रक्रिया को मिलाकर एक क्विंटल चीनी की उत्पादन लागत करीब 4,200 से 4,300 रुपये तक पहुंच जाती है।

इसके अतिरिक्त, अधिक चीनी उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा एथेनॉल के बजाय सी-हैवी शीरे के उपयोग का निर्देश देने से मिलों के अतिरिक्त मुनाफे का स्रोत भी प्रभावित हुआ है। इस दबाव से उबरने के लिए मिल मालिक अब मांग कर रहे हैं कि सरकार गन्ने के दाम बढ़ाने से पहले चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य 31 रुपये से बढ़ाकर 50 रुपये प्रति किलोग्राम करे।

यह पूरा आर्थिक गतिरोध अब केवल खेतों और मिलों तक सीमित न रहकर एक वृहद राजनीतिक मुद्दा बन चुका है, विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में जहां गन्ने की खेती पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे की रीढ़ है। यद्यपि राज्य सरकार यह दावा कर रही है कि उसने 2017 से अब तक गन्ना किसानों के बैंक खातों में 3.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक का रिकॉर्ड भुगतान किया है और पिछले सत्र का 95 प्रतिशत से अधिक बकाया चुका दिया गया है, लेकिन 2027 के आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार के लिए यह स्थिति किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

एक ओर किसानों का वह विशाल और मुखर मतदाता वर्ग है जिसकी आजीविका गन्ने पर टिकी है, तो दूसरी ओर मिलों को दिवालिया होने से बचाने की औद्योगिक चुनौती है। ऐसे में राज्य मंत्रिमंडल द्वारा लिया जाने वाला अंतिम निर्णय न केवल उत्तर प्रदेश की गन्ना अर्थव्यवस्था का भविष्य तय करेगा, बल्कि राज्य के भावी चुनावी और राजनीतिक समीकरणों को भी पूरी तरह से पलट सकता है।

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