उत्तर प्रदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त फैसला: देवरिया में अवैध हिरासत मामले में पुलिस अधिकारी के वेतन से वसूला जाएगा मुआवजा

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले स्थित गौरी बाजार थाने में आम नागरिकों को अवैध रूप से हिरासत में रखने के एक गंभीर मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। अदालत ने नागरिकों के अधिकारों के हनन को गंभीरता से लेते हुए तत्कालीन थाना प्रभारी (एसएचओ) डॉ. महेंद्र कुमार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

न्यायालय ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह पीड़ित याचिकाकर्ताओं को तत्काल प्रभाव से मुआवजे का भुगतान करे। सबसे अहम बात यह है कि इस मुआवजे की पूरी रकम विभागीय जांच के बाद दोषी पाए जाने वाले जिम्मेदार पुलिस अधिकारी के वेतन से काटी जाएगी, ताकि भविष्य में खाकी की ऐसी मनमानी पर रोक लग सके।

इस मामले की पृष्ठभूमि पुलिस द्वारा शक्तियों के घोर दुरुपयोग को दर्शाती है। अदालत के समक्ष पेश किए गए तथ्यों के अनुसार, पुलिस ने एक याचिकाकर्ता महेंद्र गौर को बिना किसी वैध कारण के दो दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा था। वहीं, अन्य तीन याचिकाकर्ताओं को 13 अप्रैल 2026 से लेकर 23 अप्रैल 2026 तक, यानी पूरे 10 दिनों तक थाने में गैरकानूनी तरीके से बैठाकर रखा गया।

पुलिस की इस मनमानी पर कड़ा प्रहार करते हुए हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि 10 दिन तक हिरासत में रहे तीन याचिकाकर्ताओं को बीस-बीस हजार रुपये और दो दिन तक हिरासत में रहे याचिकाकर्ता को पांच हजार रुपये बतौर मुआवजा दिए जाएं। अदालत ने यह भी साफ कर दिया है कि मुआवजे की भरपाई संबंधित अधिकारी की सैलरी से होगी और भविष्य की चेतावनी के तौर पर उसके सेवा रिकॉर्ड (सर्विस बुक) में भी इस अनुचित आचरण को प्रमुखता से दर्ज किया जाएगा।

सुनवाई के दौरान थानों में लगे सीसीटीवी कैमरों की स्थिति और कार्यप्रणाली को लेकर भी अदालत ने पुलिस प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई। हाईकोर्ट ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह’ मामले के फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट रूप से यह निर्देशित किया गया है कि देश के सभी थानों में सीसीटीवी कैमरे चौबीसों घंटे चालू हालत में होने चाहिए।

हालांकि, इस मामले में चौंकाने वाली बात यह रही कि जिस विशिष्ट अवधि में याचिकाकर्ताओं को अवैध रूप से थाने में बंधक बनाकर रखा गया था, उस दौरान गौरी बाजार थाने के सीसीटीवी कैमरे रहस्यमयी तरीके से बंद पाए गए और पुलिस कोई भी फुटेज अदालत में उपलब्ध नहीं करा सकी।

सीसीटीवी फुटेज गायब होने के इस कृत्य को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 119 का विशेष रूप से उल्लेख किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनी सिद्धांत के अनुसार यदि कोई ऐसा महत्वपूर्ण साक्ष्य मौजूद है जिसे पेश किया जा सकता है, लेकिन उसे जानबूझकर छिपाया जाता है, तो कानून की नजर में यही माना जाता है कि वह साक्ष्य उसे छिपाने वाले पक्ष के खिलाफ जाता है।

इसी ठोस कानूनी आधार पर हाईकोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध न होने की स्थिति को पुलिस के खिलाफ माना और याचिकाकर्ताओं के अवैध हिरासत के दावों को पूरी तरह से सत्य ठहराया। अदालत ने इस पूरी घटना को पुलिस द्वारा आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का गंभीर और अस्वीकार्य उल्लंघन करार दिया है।

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