
केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया है कि वह उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को दूर करने के लिए लागू किए गए विवादास्पद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियमों पर पुनर्विचार करेगी । सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि नियमों के प्रावधानों पर उठाई गई चिंताओं के मद्देनजर वह नियमों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने की योजना बना रही है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय को आश्वासन दिया कि सभी समुदायों के छात्रों के हितों की रक्षा की जाएगी और किसी भी वर्ग को असुरक्षित, असंतुष्ट या भेदभावग्रस्त महसूस नहीं करना चाहिए।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को नियमों को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई की और उनकी संभावित व्याख्या और कार्यान्वयन पर चिंता व्यक्त की। सुनवाई के दौरान, सीजेआई ने इस बात पर भी जोर दिया कि ऐसे नियम बनाते समय प्रत्येक छात्र के हितों की रक्षा की जानी चाहिए और देश की युवा पीढ़ी को ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह घटनाक्रम तब सामने आया है जब सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही विवादास्पद नियमों के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी थी।
कार्यवाही के दौरान, अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने नए यूजीसी नियमों के तहत जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा पर सवाल उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि कानून को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि भेदभाव केवल समाज के किसी विशेष वर्ग के खिलाफ ही हो सकता है। विष्णु शंकर जैन ने पीठ के समक्ष कहा, “मैं जाति-आधारित भेदभाव की इस परिभाषा पर रोक लगाने की मांग कर रहा हूं। कानून यह मानकर नहीं चल सकता कि भेदभाव केवल एक विशेष वर्ग के खिलाफ ही होगा। यह नहीं माना जा सकता कि भेदभाव केवल एक वर्ग के खिलाफ ही होता है। उनके तर्कों का जवाब देते हुए, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने देश के विभिन्न हिस्सों के छात्रों से संबंधित एक काल्पनिक स्थिति का उल्लेख किया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि अगर दक्षिण भारत का कोई छात्र उत्तर भारत के किसी विश्वविद्यालय में दाखिला ले ले, या उत्तर भारत का कोई छात्र दक्षिण भारत के किसी संस्थान में दाखिला ले ले, और दोनों पक्षों को एक-दूसरे की जाति का पता न होने के बावजूद अपमानजनक या व्यंग्यात्मक टिप्पणियों का सामना करना पड़े तो क्या होगा? मुख्य न्यायाधीश ने प्रश्न किया कि नए नियमों का कौन सा प्रावधान ऐसी स्थिति को कवर करेगा। जवाब में अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने कहा कि नियमों की धारा 3(ई) ऐसे मामलों को कवर करती है। सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश ने शैक्षणिक संस्थानों और समाज में विभाजन पैदा होने की संभावना पर व्यापक चिंता व्यक्त की।



