
तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के मंच से एक बार फिर कश्मीर मुद्दे को उठाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद छेड़ने की कोशिश की है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी में दिए गए अपने संबोधन में एर्दोगन ने कहा कि दक्षिण एशिया में शांति के लिए कश्मीर सहित सभी विवादों का समाधान संयुक्त राष्ट्र चार्टर और उससे संबंधित प्रस्तावों के दायरे में बातचीत के जरिए निकाला जाना चाहिए।
भारत के कड़े और निरंतर विरोध के बावजूद तुर्किये के राष्ट्रपति लगातार इस वैश्विक मंच का इस्तेमाल कश्मीर का मुद्दा उठाने के लिए करते रहे हैं। उनका यह बयान तुर्किये द्वारा पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में शामिल होने के कुछ ही हफ्तों बाद सामने आया है।
अपने संबोधन में कश्मीर के अलावा एर्दोगन ने गाजा की गंभीर मानवीय स्थिति और फिलिस्तीन को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की पुरजोर वकालत की। फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास के लगातार दूसरे वर्ष महासभा में उपस्थित न हो पाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि तुर्किये फिलिस्तीनी जनता की आवाज उठाना जारी रखेगा।
इसके साथ ही उन्होंने इजरायल के सैन्य अभियानों की तीखी आलोचना की और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधारों की मांग दोहराई। उन्होंने तुर्की साइप्रस के अंतरराष्ट्रीय अलगाव को समाप्त करने की भी अपील की।
कश्मीर पर बयानबाजी करना एर्दोगन के संयुक्त राष्ट्र संबोधनों की एक पुरानी परिपाटी रही है, जिसकी शुरुआत विशेष रूप से वर्ष 2019 में भारत द्वारा अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद से तेज हुई। उस समय एर्दोगन ने दावा किया था कि कश्मीर में लाखों लोग नाकेबंदी में हैं और दुनिया इस पर ध्यान नहीं दे रही है।
उनके इस बयान पर भारत ने बेहद सख्त प्रतिक्रिया दी थी, जिसके परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तुर्किये दौरा रद्द हुआ था और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग में भी कटौती की गई थी। इसके बाद 2021 में भी जब उन्होंने इस मुद्दे को दोहराया, तो भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि एर्दोगन की टिप्पणियां न तो इतिहास की समझ को दर्शाती हैं और न ही कूटनीति के सिद्धांतों को।
हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच तनाव में आए ठहराव के बाद भी एर्दोगन ने 80वें यूएन सत्र में इस मुद्दे को पुनर्जीवित किया और युद्धविराम का स्वागत करते हुए संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के आधार पर समाधान की बात कही। हर बार की तरह इस बार भी भारत ने अपना पक्ष पूरी दृढ़ता से स्पष्ट किया है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग हैं।
नई दिल्ली ने बार-बार यह दोहराया है कि किसी भी तीसरे देश को भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है और अंतरराष्ट्रीय मंचों का उपयोग द्विपक्षीय मुद्दों को उछालने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।


