#शौर्यगाथा5 : ननिबाला के विभिन्न अंगों में अंग्रेजो ने भरी पिसी हुई मिर्च

शौर्यगाथालखनऊ| शौर्यगाथा की पांचवी कड़ी में हम आप को वीरांगना ननिबाला देवी के बारे में बता रहे हैं इन्हें पश्चिम बंगाल की पहली महिला क्रांतिकारी भी माना जाता है। बीसवीं सदी के दूसरे दशक में ननिबाला देवी कलकत्ता, चन्द्रनगर व चटगांव आदि नगरों में क्रांतिकारियों को आश्रय देने, उनके अस्त्र-शस्त्र रखने एवं गुप्तचर पुलिस को चकमा देने के कारण पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर अमानवीय यातनाएं दी, यहां तक कि उनके विभिन्न अंगों में पिसी हुई मिर्च तक भरी गई लेकिन इस महान क्रांतिकारी ने हार नहीं मानी। आइए शौर्यगाथा में जानते हैं इस वीरांगना के बारे में जो इतिहास के पन्नों में शायद कहीं खो गई…

शौर्यगाथा5 : ननिबाला देवी का जन्म 1888 ई. में हावड़ा में हुआ था

प्रसिद्ध क्रांतिकारी ननिबाला देवी का जन्म 1888 ई. में हावड़ा में हुआ था। साधारण शिक्षा घर में हुई और 11 वर्ष की उम्र में उनका विवाह कर दिया गया। किन्तु विवाह के 5 वर्ष के बाद ही वे विधवा हो गईं।

अब उन्होंने अपना ध्यान अध्ययन की ओर लगाया और ईसाई मिशन के स्कूल में अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त की। परंतु विचार-संबंधी मतभेदों के कारण उन्हें मिशन छोड़ना पड़ा।
इसके बाद वे अपने दूर के भतीजे अमरेन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय के संपर्क में आईं। अमरेन्द्र प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन युगांतर पार्टी के प्रमुख नेता थे। इसके बाद ननिबाला देवी क्रांतिकारी संगठन में सम्मलित हो गईं। प्रथम विश्वयुद्ध के दिनों में वे भूमिगत क्रांतिकारियों के लिए भोजन आदि की व्यवस्था करती रहीं।
उन्हीं दिनों ननिबाला ने ऐसा साहसिक काम किया जो इन दिनों किसी हिन्दू विधवा के लिए अकल्पनीय था। दरअसल रामचंद्र मजूमदार नाम के एक क्रांतिकारी जेल में बंद थे और गिरफ्तारी से पहले वे अपना रिवाल्वर कहां छिपा गए इसका पता उनके साथियों को नहीं था।

शौर्यगाथा5 : ननिबाला के साथ गिरफ्तारी पर किया अमानवीय बर्ताव

ननिबाला ने स्वयं को रामचंद्र मजूमदार की पत्नी बताया, जेल में उनसे भेंट की और रिवाल्वर का पता लगा लिया। परंतु पुलिस को बाद में उनकी गतिविधियों की भनक लग गई और वे उन्हें खोजने लगी। इस पर ननिबाला कोलकाता छोड़कर लाहौर चली आईं। वहां वे बीमार पड़ गई और तभी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

क्रांतिकारियों के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से उनके साथ बड़ा ही क्रूर और अमानविय बर्ताव किया गया। यहां तक कि उनके विभिन्न अंगों में पिसी हुई मिर्च तक भरी गई। दर्द से कराहती हुई ननिबाला ने महिला पुलिस को जोरदार ठोकर मारी और बेहोश हो गईं। बाद में उन्हें कोलकाता के प्रेसिडेंसी जेल में रखा गया।

यहां की व्यवस्था के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल कर दी। जब गोल्डी नाम के पुलिस सुपरिडेंट ने उनके लिखित मांग पत्र को उनके सामने ही फाड़ कर फेंक दिया तो ननिबाला ने यहां भी पूरी ताकत से एक घूंसा उसके मुंह पर जमा दिया।
इस वीरांगना की शहादत को सलाम
1919 की आम रिहाई में वे जेल से बाहर आईं और बीमार पड़ गईं। एक साधु ने उनका उपचार किया और अंत में ननिबाला ने भी गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया। 1967 में उनका देहांत हो गया।

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