श्रमिकों के हित में यूपी सरकार

akमई दिवस अन्तरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है। मजदूरों के शिकागो में १८८६ के आंदोलन की याद की जाती है, जब मजदूरों के कार्य के घंटे तय नहीं थे। इसी आंदोलन के बाद मजदूरों के लिए काम के ८ घंटे तय किये गये। भारत में १९३३ से इसकी शुरुआत हुई। इन सब बातों का उल्लेख इसलिए किया जाता है ताकि हमें याद रहे कि आज जो हालात हैं, उनमें हम बहुत ज्यादा सुधार नहीं कर पाये हैं। मजदूरों के लिए तो हालात और बदतर हो गये हैं। उनसे कभी-कभी ऐसे काम लिये जाते हैं जो उनके लिए मौत का सबब तक बन जाते हैं। भवन निर्माण करते समय कभी बेसमेन्ट की खुदाई में मिट्टी ढह जाती है तो कभी कोई मजदूर बहुमंजिले भवन की
ऊपरी मंजिल से गिर कर अपनी जान से हाथ धो बैठता है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने पहली मई २०१६ को मजदूर दिवस के अवसर पर कुछ ऐसे प्रयास किये हैं जिनकी तारीफ की जा सकती है। श्री अखिलेश यादव की सरकार ने नारा दिया है कि श्रमिकों के साथ, प्रदेश का विकास, समाजवादी सरकार का यही प्रयास। यह नारा अपने यथार्थ रूप में कार्यान्वित होगा, ऐसी उम्मीद करनी चाहिए।
प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी पहली मई को मजदूर दिवस मनाया गया। अपने पत्रिकारिता जीवन में मैंने लखनऊ में मई दिवस कार्यक्रम बहुत धूमधाम से मनाये जाते हुए देखे हैं, इस बार इन कार्यक्रमों को देखकर मन कुछ फीका हो गया। हालांकि जिन मजदूरों की बात की जाती है, पत्रकार उन मजदूरों में कभी फिट नहीं बैठते। आज तो पत्रकारों की एक जमात ऐसी है जो राजनीतिकों के जीवन स्तर के समान है। मई दिवस समारोहों का आयोजन पत्रकारों के संगठन ही करते रहे हैं। कार्ल माक्र्स ने कहा था कि दुनिया के मजदूरों एक हो लेकिन लखनऊ में पिछले लगभग ३६ साल से देख रहा हूं कि पत्रकार एक होने की जगह कई-कई टुकड़ों में बंट गये हैं। ऐसे में मजदूरों का हित वे कितना कर पाएंगे, यह कल्पना की जा सकती है। इसके बावजूद पत्रकारों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे प्रदेश में लागू श्रम कल्याण नियमों का पालन करवाने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकते हैं। सरकार जो योजनाएं बनाती हैं, उनका कार्यान्वयन यदि ईमानदारी से नहीं हो रहा है तो, इसके लिए अपनी कलम की ताकत दिखा सकते हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस बार मई दिवस पर निर्माण मजदूरों को सरकारी पेंशन देने और मजदूरों को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने की योजना शुरू की है। उत्तर प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कल्याण बोर्ड के पंजीकृत श्रमिकों को मुख्यमंत्री ने साइकिलें प्रदान कीं, उनको पेंशन योजना में शामिल किया और दोपहर में जब मजदूर काम करके थोड़ी देर के लिए भोजन कर विश्राम करता है तो उसे १० रुपये में मध्याह्न भोजन योजना की शुरुआत की है। गरीबों को सस्ते दर पर भोजन की शुरुआत सबसे पहले तमिलनाडु में मुख्यमंत्री सुश्री जयललिता ने की थी। उन्होंने जगह-जगह अम्मा रसोई बनवाईं जहां बहुत ही कम दाम पर पौष्टिक भोजन मिलता है। इसके बाद यह योजना दिल्ली में शुरू की गयी। कुछ अन्य राज्यों ने भी इस प्रकार की योजना बना रखी है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ में विधान भवन के सामने, जहां नया सचिवालय भवन बन रहा है, वहां पर मजदूरों को १० रुपये में मध्याह्न का भोजन उपलब्ध कराने के लिए पायलेट प्रोजेक्ट बनाया है। इस प्रकार के भोजनालय राजधानी लखनऊ के अन्य क्षेत्रों में भी शुरू किये जाएंगे, विशेष रूप से वहां, जहां श्रमिकों की मण्डियां लगती है और श्रमिक आस-पास ही काम करके शाम को अपने घर (झुग्गी-झोपड़ी)़ में वापस चले जाते हैं। बिहार, छत्तीसगढ़ आदि से आने वाले ज्यादातर मजदूरों को यह मध्याह्न भेाजन काफी हितकर होगा। इस प्रकार वे चार पैसे कमाकर अपने ‘देस’ (इस प्रकार के मजदूर जहां से आये हैं, उसको ही अपना देस कहते हैं) वापस ले जा सकेंगे। इसी से जुड़ी साइकिल और बीमा योजना है। इन मजदूरों का कोई संगठन नहीं और न कोई एक बस्ती या मोहल्ला है। शहर में गंदे नालों के किनारे या खाली पड़ी जमीन पर घास-फूस की झोपड़ी बनाकर पत्नी व बच्चों के साथ रहने लगते हैं। इनमें कुछ मजदूर दो-चार दिनों के लिए ही आते हैं जबकि उनकी संख्या ज्यादा है जो जाड़ा, गर्मी और बरसात में भी यहीं पड़े रहते हैं।
इस तरह के मजदूरों का भविष्य सुरक्षित करना कल्याणकारी राज्य का कर्तव्य हो जाता है। मजदूर दिवस पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ऐसे ही मजदूरों का पंजीकरण करने का निर्देश दे रखा है। बहुमंजिले भवनों में एक तरफ जहां निर्माण कार्य के दौरान दुर्घटनाओं का जोखिम रहता है, वहीं यहां काम करने वाले मजदूर एक साल से अधिक समय तक इसी कार्य में लगे रहते हैं। इस दौरान उनका जीवन सुरक्षित रहे और यदि कोई आपदा आ जाए तो उनके बच्चों को गुजारे के लिए सरकार ने उत्तर प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड बना रखा है। भवनों की तरह ही सडक़ों के निर्माण में भी मजदूरों को लम्बे समय तक रुकना पड़ता है। इनका कोई रिकार्ड न होने से मजदूरों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं को या तो नजरंदाज कर दिया जाता है अथवा चंद रुपये थमाकर पीडि़तों का मुंह बंद कर दिया जाता है। साथी मजदूर भी अपनी चार पैसे की कमायी पर ही ध्यान देते हैं। मजदूरों में इस प्रकार की जागरूकता भी पैदा करने की जरूरत है ताकि वे पंजीकृत रूप से सरकार की निगाह में रहें।
प्रदेश के मुख्यमंत्री की इस महत्वपूर्ण योजना पर पत्रकारों के मई दिवस समारोहों में चर्चा तक नहीं हुई। वे पत्रकारों की यह पीड़ा ही सुनाते रहे कि मालिक उन पर अन्याय करते हैं, वेतन बोर्ड लागू नहीं करते। पत्रकारों ने अपने पुराने इतिहास को याद किया जब कोई पत्रकार सिर्फ अपने संपादक को पहचानता था और समाचार पत्र के मालिक उसके पास आते तक नहीं थे लेकिन अब समाचार पत्र के मालिक ही सम्पादक हो गये हैं और न काम के घंटे तय हैं और न वेतन। सब कुछ मालिक की मर्जी पर है। यहां तक कि कलम पर भी उनका नियंत्रण रहता है। समारोह के दौरान एक समारोह में प्रदेश के श्रम एवं सेवायोजन मंत्री श्री शहिद मंजूर ने तो दूसरे समारोह में सपा प्रमुख मुलायम सिंह की दूसरी बहू अपर्णा यादव ने बहुत सटीक जवाब दिया कि इसके लिए दोषी कौन हैं, यह पत्रकारों को ही सोचना पड़ेगा। (हिफी)

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