बिना बुलाये जाने से मर्यादा नहीं रहती

a2बातचीत के दौरान हम अक्सर बोल देते हैं। कभी-कभी आपस में बातें करने वाले टोक भी देते हैं कि आपसे तो हमने नहीं पूछा था। यह बहुत सामान्य उदाहरण है। इसी प्रकार जहां हमें बुलाया नहीं गया, वहां पहुंच जाने से भी अपमान का भय रहता है। गोस्वामी तुलसीदास ने सती और भगवान शंकर के बीच वार्ता के इस प्रसंग में मुख्य रूप से यही बात समझाई है। सती को अपने पिता के यज्ञ में जाने का मन है लेकिन दक्ष प्रजापति ने निमंत्रण नहीं दिया है। इस प्रकार यज्ञ में बिना बुलावे के ही सती जाना चाहती हैं। सती ने भगवान शंकर से जब अपने पिता के यज्ञ में जाने की आज्ञा मांगी तो भगवान शंकर ने कहा-

कहेहु नीक मोरेहु मन भावा, यह अनुचित नहीं नेवत पठावा।
दच्छ सकल निज सुता बोलाई, हमरे बयर तुम्हउ बिसराई।
ब्रह्म सभाँ हम सन दुखु माना, तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना।
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी, रहइ न सीलु सनेहु न कानी।

सती! तुमने बहुत ठीक कहा है और यह मेरे मन को भी पसंद आयी है पर आपके पिता दक्ष ने नेवता (निमंत्रण) नहीं भेजा, यह अनुचित है। दक्ष ने अपनी सब लड़कियों को बुलाया है लेकिन हमसे बैर (अनबन) के कारण तुमको भी भुला दिया। शंकर जी ने कहा कि एक बार ब्रह्मा की सभा में हमसे नाराज हो गये थे उसी से वे अब भी हमारा अपमान करते हैं। हे! भवानी जो तुम बिना बुलाए जाओगी तो न शील-स्नेह ही रहेगा और न मान-मर्यादा ही रहेगी।

जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा, जाइअ बिनु बोलेहुं न संदेहा।
तदपि विरोध मान जहँ कोई, तहाँ गए कल्यान न होई।

शंकर जी ने सती को समझाते हुए कहा कि हालांकि इसमेेें संदेह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए भी जाना चाहिए तो भी जहां कोई विरोध मानता हो, उसके घर जाने से कल्याण नहीं होता।

भांति अनेक संभु समुझावा, भावी बस न ग्यानु उर आवा।
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएं, नहिं भलि बात हमारे भाएँ।

इस प्रकार शंकर जी ने सती को अनेक प्रकार से समझाया लेकिन होनहार वश (भावी) सती के हृदय में बोध नहीं हुआ। सती का मन देखकर भगवान शंकर ने कहा कि यदि बिना बुलाए जाओगी तो हमारी समझ में अच्छी बात नहीं होगी।

कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छ कुमारि।
दिए मुख्य गन संग तब, विदा कीन्ह त्रिपुरारि।

शिव जी ने बहुत बार कहकर देख लिया लेकिन जब सती किसी प्रकार भी नहीं रुकीं तो त्रिपुरारि महादेव ने अपने मुख्य सेवकों को उनके साथ भेजकर बिदा कर दिया।

पिता भवन जब गईं भवानी, दच्छ त्रास काहूँ न सनमानी।
सादर भलेहिं मिली एक माता, भगिनी मिलीं बहुत मुसुकाता।
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता, सतिहि बिलोकि जरे सब गाता।
सती जाइ देखेउ तब जागा, कतहुं न दीख संभु कर भागा।

इस प्रकार शंकर जी के रोकने के बाद भी सती जब अपने पिता दक्ष प्रजापति के घर पहुंचीं तो दक्ष के भय से किसी ने भी उनका सम्मान नहीं किया। गोस्वामी तुलसीदास ने अन्यत्र एक दोहा इस संदर्भ में और लिखा है-

आवत ही हरषेउ नहीं, नयनन नहीं सनेह।
तुलसी तहां न जाइए, कंचन बरसइ मेह।

अर्थात जिसके घर आप गये हैं उसके हृदय में आपको देखकर हर्ष न हो, नेत्रों में स्नेह न दिखाई पड़े तो वहां कभी नहीं जाना चाहिए, भले ही उसके घर सोने की बरसात हो रही हो। कहने का तात्पर्य यह कि जाने पर तुरंत यह मालूम पड़ जाता है कि उसके आने से खुशी हुई है अथवा नहीं। सती को भी तुरंत मालूम हो गया कि उनके आने से कोई खुश नहीं है। मां का स्नेह तो जग विदित है। सती को आदर के साथ माता मिलीं और सती की बहनें भी मुस्कराती हुई मिलीं लेकिन पिता दक्ष ने उनकी कुशलता तक नहीं पूछी, उल्टे दक्ष के तन-बदन में आग लग गयी। यह व्यवहार देखने के बाद सती यज्ञ स्थल पर पहुंची तो वहां सभी देवताओं का आसन था लेकिन शंकर जी का कोई स्थान ही नहीं था। इस प्रकार देवताओं के बीच शंकर जी का अपमान किया जा रहा था।

तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ, प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ।
पाछिल दुखुन हृदय अस व्यापा, जस यह भयउ महा परितापा।
जद्यपि जग दारून दुख नाना, सबतें कठिन जाति अवमाना।
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा, बहु विधि जननी कीन्ह प्रबोधा।

सती ने जब यह देखा तो उनकी समझ में आया कि शंकर भगवान ने क्या कहा था। स्वामी का अपमान समझकर सती का हृदय जल उठा। पिछला पति परित्याग का दुख उनके हृदय में उतना नहीं व्यापा था, जितना महान दुख और परिताप इस समय पति के अपमान के कारण हुआ। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि इस संसार में यद्यपि अनेक प्रकार के दारुण दुख है तथापि जाति का अपमान सबसे बढक़र कठिन है। यह सोचकर सती जी को बहुत क्रोध आया, उनकी माता ने सती का क्रोध समझा और बहुत प्रकार से समझाया-बुझाया भी लेकिन-

सिव अपमानु न जाइ सहि, हृदय न होइ प्रबोध।
सकल सभहिं हठि हटकि तब, बोलीं बचन सक्रोध।
सती को भगवार शंकर जो
उनके पति हैं, का अपमान किसी भी तरह से सहन नहीं हो सका।

माता का समझाना-बुझाना भी उनके हृदय पर कोई प्रभाव नहीं डाल सका। सती ने समस्त सभा को हठपूर्वक डांटकर क्रोध भरे बचन में
क्या कहा यह अगले प्रसंग में
बताएंगे। -क्रमश: (हिफी)

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