उत्तराखंड

उत्तराखंड में खत्म होगा 153 साल पुराना ब्रिटिश कालीन सिंचाई कानून: धामी कैबिनेट ने दी नए विधेयक को मंजूरी, चंपावत में लिए गए कई ऐतिहासिक फैसले

उत्तराखंड सरकार ने राज्य की विशेष भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए 153 साल पुराने ब्रिटिश कालीन कानून को खत्म करने का एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। रविवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में अंग्रेजों के जमाने के ‘नॉर्दर्न इंडिया कैनाल एंड ड्रेनेज एक्ट, 1873’ को निरस्त कर उसकी जगह नया कानून लाने पर मुहर लगाई गई।

सरकार जल्द ही विधानसभा में ‘उत्तराखंड सिंचाई एवं जल निकासी विधेयक, 2026’ पेश करेगी। यह नया कानून पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों की जल प्रबंधन जरूरतों, नहरों की व्यवस्था और जल निकासी के तंत्र को आधुनिक और प्रभावी बनाने में मददगार साबित होगा। यह कैबिनेट बैठक चंपावत जिले के टनकपुर-बनबसा स्थित एनएचपीसी परिसर में आयोजित की गई थी, जो मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र भी है। यह पहला मौका था जब राज्य कैबिनेट की औपचारिक बैठक चंपावत में संपन्न हुई।

इस कैबिनेट बैठक में उच्च शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कई अन्य महत्वपूर्ण फैसले भी लिए गए। राज्य में निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना को लेकर मौजूदा नीति और मानकों में संशोधन को मंजूरी प्रदान की गई है। नए नियमों के अनुसार, अब पहाड़ी क्षेत्रों में निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए न्यूनतम 2,500 वर्ग मीटर और मैदानी क्षेत्रों में कम से कम 20,000 वर्ग मीटर निर्मित क्षेत्र (बिल्ट-अप एरिया) होना अनिवार्य होगा।

साथ ही, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए निजी विश्वविद्यालयों के प्रस्तावों का मूल्यांकन करने के अलग और कड़े मापदंड तय किए जाएंगे। वहीं स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए सीनियर रेजिडेंट, जूनियर रेजिडेंट और डिमॉन्स्ट्रेटर के वेतन व मानदेय में संशोधन के प्रस्ताव को भी हरी झंडी दी गई, जिससे अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं और बेहतर हो सकेंगी।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बैठक के बाद कहा कि सरकार की यह स्पष्ट नीति है कि कैबिनेट बैठकें अब केवल राजधानी देहरादून तक ही सीमित नहीं रहेंगी। राज्य के अलग-अलग जिलों और दूरदराज के क्षेत्रों में कैबिनेट बैठकों का आयोजन किया जाएगा ताकि स्थानीय मुद्दों, विकास की संभावनाओं और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को सरकार के सामने सीधे रखा जा सके। उन्होंने कहा कि इस पहल से शासन-प्रशासन और आम जनता के बीच की दूरी कम होगी तथा जनसंवाद मजबूत होगा।

मुख्यमंत्री ने सीमांत क्षेत्रों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सीमावर्ती क्षेत्र केवल भौगोलिक सीमाएं नहीं हैं, बल्कि वे देश की सुरक्षा, संस्कृति और समग्र विकास की एक बेहद अहम कड़ी हैं। बैठक के दौरान मुख्यमंत्री और सभी कैबिनेट मंत्रियों को चंपावत की लोक संस्कृति का प्रतीक ‘फर्रा’ या ‘छंतोली’ भेंट किया गया। यह पारंपरिक ढाल देवीधुरा के प्रसिद्ध ‘बग्वाल’ मेले में इस्तेमाल की जाती है, जिसे रिंगाल (पहाड़ी बांस) की तीलियों से छतरी के आकार में बेहद खूबसूरती से तैयार किया जाता है।

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