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अहोई अष्टमी 2017: संतान की रक्षा के लिए इस विधि से करें अहोई माता को प्रसन्न

अहोई अष्टमीआज अहोई अष्टमी मनाई जा रही है. इस व्रत में वह महिलाएं पूजा करती हैं, जिनके बच्चे होते हैं. अपनी संतान के कल्याण के लिए महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं. अहोई अष्टमी व्रत करने वाली महिलाएं घर की दीवार पर अहोई का चित्र बनाती हैं.

इस व्रत का बहुत महत्व है. यह व्रत संतान की शिक्षा, करियर और कारोबार में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए रखा जाता है. मां अपने बच्चों की रक्षा और दीर्घायु के लिए तो व्रत रखती हैं. कुछ महिलाएं इस व्रत को संतान की प्राप्ति के लिए भी करती हैं. इस व्रत का उत्तर भारत में प्रचलन अधिक है.

पूजा विधि

व्रत के दिन प्रात: उठकर स्नान किया जाता है और पूजा के समय ही संकल्प लिया जाता है कि “हे अहोई माता, मैं अपने पुत्र की लम्बी आयु एवं सुखमय जीवन हेतु अहोई व्रत कर रही हूं. अहोई माता मेरे पुत्रों को दीर्घायु, स्वस्थ एवं सुखी रखें.”

इस व्रत में माता पर्वती की पूजा की जाती है. अहोई माता की पूजा के लिए गेरु से अहोई माता का चित्र बनाया जाता है और साथ ही स्याहू और उसके सात पुत्रों का चित्र भी निर्मित किया जाता है. अहोई माता के सामने चावल की कटोरी, मूली, सिंघाड़े रखा जाता है और दीपक जला कर कथा का पाठ किया जाता है. कथा कहते और सुनते समय चावल हाथ में लिए जाते हैं और पूजा के बाद उन्हें साड़ी/सूट के दुप्पटे में बांध लिया जाता है.

सुबह पूजा करते समय लोटे में पानी और उसके ऊपर करवे में पानी रखते हैं. वही करवा लें, जो करवाचौथ में इस्तेमाल किया गया हो. इस करवे का पानी दिवाली के दिन पूरे घर में भी छिड़का जाता है. शाम के समय में सुबह बनाए गए चित्रों की पूजा की जाती है. पके खाने में चौदह पूरी और आठ पूड़ियों का भोग अहोई माता को लगाया जाता है. उस दिन बैना निकाला जाता है. इस बैने में चौदह पूरी या मठरी या काजू होते हैं. लोटे का पानी शाम को चावल के साथ तारों को अर्घ दिया जाता है.

अहोई पूजा में एक अन्य विधि यह भी है कि चांदी की अहोई बनाई जाती है, जिसे स्याहू कहते हैं. इस स्याहू की पूजा रोली, अक्षत, दूध व भात से की जाती है. पूजा चाहे आप जिस विधि से करें लेकिन दोनों में ही पूजा के लिए एक कलश में जल भर कर रख लें.

पूजा के बाद अहोई माता की कथा सुने और सुनाएं. पूजा के बाद घर के बड़ों का आर्शीवाद लिया जाता है और इसके बाद व्रत खोला जाता है.

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