
उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत तैयार की गई नई मतदाता सूची को लेकर एक बड़ा विवाद उत्पन्न हो गया है। खोजी पत्रकारिता समूह ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट में निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए दावा किया है कि राज्य की मतदाता सूची में जोड़े गए 16.18 लाख नए मतदाताओं के आवेदनों का ब्योरा और उनकी पहचान को सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिसे उन्होंने चुनाव नियमों का उल्लंघन बताया है।
हालांकि, इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के तुरंत बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें पूरी तरह तथ्यहीन और भ्रामक मिथ्या धारणाओं पर आधारित करार दिया है।
रिपोर्टर्स कलेक्टिव द्वारा लगाए गए आरोपों के अनुसार, नियमों के तहत मतदाता सूची से जुड़े दावों और आपत्तियों की बूथवार सूची तथा हर आवेदन फॉर्म (बिना तस्वीर के) का पूरा ब्योरा मुख्य निर्वाचन अधिकारी की आधिकारिक वेबसाइट पर पारदर्शी रूप से उपलब्ध होना चाहिए। समूह ने तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से वेबसाइट का विश्लेषण किया और पाया कि सार्वजनिक किए गए कुल फॉर्म-6 आवेदनों की संख्या 71.38 लाख थी, जबकि अंतिम मतदाता सूची में 84.3 लाख नए नाम जोड़े गए थे।
इससे 12.92 लाख नामों का एक बड़ा अंतर सामने आया। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि यदि इन 16.18 लाख पूर्व-आवेदनों को वैध मान लिया जाए, तो भी आवेदनों की कुल मंजूरी दर लगभग 96.27 प्रतिशत बैठती है, जो अन्य राज्यों की 60-70 प्रतिशत की सामान्य मंजूरी दर की तुलना में असामान्य रूप से बहुत अधिक है। समूह ने ड्राफ्ट सूची से हटाए गए 2.89 करोड़ नामों का हवाला देते हुए पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर संदेह व्यक्त किया है।
इन गंभीर दावों के जवाब में उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि एसआईआर-2026 की पूरी प्रक्रिया लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम 1960 के तहत पूरी पारदर्शिता के साथ संपन्न की गई है।
सीईओ कार्यालय के अनुसार, जिन 16.18 लाख फॉर्म-6 का जिक्र किया जा रहा है, वे 6 जनवरी 2026 को ड्राफ्ट सूची के प्रकाशन से पूर्व, गणना चरण (27 अक्टूबर 2025 से 6 जनवरी 2026) के दौरान प्राप्त किए गए थे। इस अवधि में बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) ने घर-घर जाकर उन नागरिकों से ये फॉर्म भरवाए थे जिनके नाम मौजूदा सूची में नहीं थे।
आयोग ने स्पष्ट रूप से बताया कि नियमों के अनुसार केवल उन्हीं फॉर्म-6 आवेदनों को वेबसाइट पर प्रदर्शित किया जाना अनिवार्य है जो ड्राफ्ट सूची छपने के बाद दावा-आपत्ति की अवधि में प्राप्त होते हैं, और इस नियम का पूरी तरह पालन किया गया है।
इस पूरे मामले में अब मुख्य वैचारिक और तकनीकी विवाद इस बात पर केंद्रित हो गया है कि क्या चुनाव आयोग के मौजूदा नियम ड्राफ्ट सूची से पहले प्राप्त होने वाले आवेदनों के सार्वजनिक प्रकटीकरण की भी मांग करते हैं या नहीं।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने फॉर्म स्वीकार करने के किसी तय फॉर्मूले या निश्चित प्रतिशत की बात को भी नकारते हुए कहा है कि प्रत्येक फॉर्म पूरी वैधानिक जांच प्रक्रिया के बाद ही मंजूर किया जाता है और रिपोर्ट में बताई गई बातों को मनमानी कल्पना मात्र बताया है। फिलहाल, यह मुद्दा चुनाव आयोग की तकनीकी प्रक्रियाओं, आंकड़ों के गणित और नियमों की अलग-अलग व्याख्याओं के इर्द-गिर्द घूम रहा है।




