
राजधानी दिल्ली में 10 अक्तूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई, बड़े पैमाने पर हिरासत, मेट्रो स्टेशनों की बंदी और इंटरनेट निलंबन के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इन प्रतिबंधों से आम जनजीवन और सार्वजनिक परिवहन पर पड़े प्रभाव का आकलन करने के लिए संबंधित अधिकारियों से विस्तृत जवाब तलब किया है।
अदालत ने बंद किए गए मेट्रो स्टेशनों का स्पष्ट विवरण और भौगोलिक नक्शा पेश करने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान अदालत को अवगत कराया गया कि शुरुआत में 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने का प्रस्ताव था, जिसे अदालत के हस्तक्षेप के बाद घटाकर 47 कर दिया गया था। सॉलिसिटर जनरल ने पीठ को जानकारी दी कि बीती रात 10 बजे से सभी स्टेशनों को खोल दिया गया है। इस पर पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की कानूनी शर्तों के अधीन मेट्रो सेवाएं अपनी सामान्य समय-सारणी के अनुसार ही निर्बाध चलनी चाहिए।
अदालत में सुनवाई के दौरान इंटरनेट सेवाओं पर लगे प्रतिबंध और पूरी दिल्ली में लगाए गए बैरिकेड्स का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। इंटरनेट बहाली पर पीठ की टिप्पणी के जवाब में सॉलिसिटर जनरल ने आश्वस्त किया कि बीती रात से ही संचार सेवाएं बहाल कर दी गई हैं, जिसे अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस कदम की आलोचना करते हुए अनुराधा भसीन मामले का हवाला दिया और इंटरनेट निलंबन में न्यायिक दिशा-निर्देशों के कड़ाई से पालन की मांग की।
इसके अतिरिक्त, वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आसपास सहित पूरी दिल्ली से बैरिकेड्स हटाने की पुरजोर अपील की। अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन और कपिल सिब्बल ने भगवान दास रोड पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 लागू होने और व्यापक प्रतिबंधात्मक आदेशों के कारण आम नागरिकों की स्वतंत्र आवाजाही में आ रही भारी बाधाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की।
प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस के रवैये और मनमानी हिरासत को लेकर भी अदालत में गंभीर दलीलें पेश की गईं। वरिष्ठ अधिवक्ता शहदान फरासत ने पुलिस पर आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को घसीटकर बसों में डाला गया और दुर्व्यवहार किया गया; गौरतलब है कि फरासत को भी इस प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने हिरासत में लिया था। वरिष्ठ वकील एन. हरिहरन ने भी स्वतंत्र आवाजाही पर लगी पाबंदियों को चिंताजनक बताया। कपिल सिब्बल ने ट्रेनों और विभिन्न स्थानों से लोगों को हिरासत में लिए जाने का कड़ा विरोध करते हुए बीएनएसएस की धारा 163 के मनमाने इस्तेमाल को चुनौती दी।
इसी बीच, अदालत पर विश्वास खोने संबंधी सिब्बल की एक पिछली टिप्पणी को लेकर सॉलिसिटर जनरल ने आपत्ति दर्ज कराई, जिस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि वह वकीलों को अपनी राय व्यक्त करने से रोकने का कोई आदेश पारित नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को मंगलवार तक अपने विस्तृत जवाब और आदेशों की अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।



