
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से चिकित्सा व्यवस्था और इंसानियत को शर्मसार करने वाली एक बेहद दुखद घटना सामने आई है। बिहार के सिवान जिले के रहने वाले एक पांच वर्षीय गंभीर रूप से घायल मासूम को एंबुलेंस चालक ने डॉक्टरों द्वारा रेफर किए गए स्थान पटना ले जाने के बजाय, धोखे से गोरखपुर के एक निजी अस्पताल में लाकर भर्ती करा दिया।
इस निजी अस्पताल पर आरोप है कि उसने महज दो दिनों के भीतर इलाज के नाम पर पीड़ित परिवार से लगभग सवा लाख रुपये ऐंठ लिए और अंततः लापरवाही के कारण मासूम की जान चली गई। इस हृदयविदारक घटना ने निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और एंबुलेंस चालकों के गठजोड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह पूरी घटना बिहार के सिवान जिले के पचरुखी गांव के निवासी पांच वर्षीय प्रिंस कुमार से जुड़ी है। शनिवार की सुबह मासूम प्रिंस अपने घर के पास ही खेल रहा था, तभी वह एक तेज रफ्तार बाइक की चपेट में आ गया। इस भीषण हादसे में प्रिंस के सिर में बेहद गंभीर चोटें आईं। खून से लथपथ हालत में घबराए हुए परिजन उसे तुरंत सिवान के जिला अस्पताल लेकर पहुंचे।
वहां प्राथमिक जांच के बाद डॉक्टरों ने उसकी नाजुक स्थिति को देखते हुए बेहतर और त्वरित इलाज के लिए उसे पटना मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया था। परिवार ने बिना समय गंवाए पटना जाने के लिए एक एंबुलेंस की व्यवस्था की और वहां के लिए निकल पड़े।
यात्रा के दौरान ही एंबुलेंस चालक ने अपनी चालाकी दिखाते हुए बदहवास परिजनों को गुमराह करना शुरू कर दिया। उसने परिवार को झांसा दिया कि पटना मेडिकल कॉलेज से कहीं बेहतर और अत्याधुनिक इलाज गोरखपुर में उपलब्ध है। मजबूरी और बच्चे की जान बचाने की जद्दोजहद में फंसा परिवार उसकी बातों में आ गया। चालक उन्हें पटना ले जाने के बजाय सीधे गोरखपुर ले आया और स्पोर्ट्स कॉलेज चौराहे के पास स्थित एक निजी अस्पताल में बच्चे को भर्ती करा दिया।
परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में भर्ती होते ही प्रबंधन ने पैसों की उगाही शुरू कर दी। ऑपरेशन, महंगी दवाओं और आईसीयू के नाम पर महज दो दिनों के भीतर परिवार से लगभग 1.25 लाख रुपये जमा करा लिए गए। इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बावजूद मासूम की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और सोमवार सुबह करीब सात बजे प्रिंस ने दम तोड़ दिया।
मानवता को शर्मसार करने वाली बात यह रही कि परिजनों के अनुसार, बच्चे की मौत हो जाने के बाद भी अस्पताल प्रशासन लगातार इलाज के नाम पर और पैसों की मांग कर रहा था। जब परिजनों को शक हुआ और उन्होंने किसी तरह जबरन आईसीयू में जाकर देखा, तो उन्हें पता चला कि उनके लाडले की सांसें बहुत पहले ही थम चुकी थीं। इस खुलासे के बाद परिवार का दुख और आक्रोश फूट पड़ा और उन्होंने अस्पताल परिसर में इलाज में घोर लापरवाही का आरोप लगाते हुए भारी हंगामा शुरू कर दिया।
मामले को बिगड़ता देख अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस को बुला लिया। मौके पर पहुंची पुलिस ने किसी तरह समझा-बुझाकर आक्रोशित परिजनों को शांत कराया। दुख और हताशा में डूबा परिवार बिना कोई कानूनी कार्रवाई किए अपने बच्चे का शव लेकर वापस अपने गांव लौट गया।
चिलुआताल थाना प्रभारी सूरज सिंह ने इस पूरे प्रकरण पर स्पष्ट किया है कि फिलहाल थाने में कोई आधिकारिक सूचना या शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। यदि पीड़ित परिवार की ओर से कोई लिखित प्रार्थना पत्र प्राप्त होता है, तो मामले की गहन जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।



