
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां और विवाद काफी तेज हो गए हैं। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इस पुनरीक्षण प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ओवैसी ने दावा किया है कि राज्य में एसआईआर अभियान के दौरान ही 16 लाख से अधिक नए मतदाताओं के आवेदन यानी ‘फॉर्म 6’ को मंजूरी दी गई है।
चुनाव आयोग की तय नियमावली का हवाला देते हुए उन्होंने यह मुद्दा उठाया कि जब पुनरीक्षण प्रक्रिया शुरू होने के उपरांत नए आवेदनों की स्वीकृति को लेकर विशेष दिशा-निर्देश और कथित पाबंदियां प्रभावी थीं, तो इतनी बड़ी तादाद में इन फॉर्मों को कैसे स्वीकृत किया गया। इसके साथ ही उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया के आधिकारिक आंकड़ों को सार्वजनिक करने में हुई कथित देरी पर भी आपत्ति जताई और आशंका व्यक्त की कि इस व्यवस्था का उपयोग मतदाता सूची को राजनीतिक रूप से प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।
मतदाता सूची की शुचिता को लेकर विपक्षी दलों की ओर से यह सवाल केवल एआईएमआईएम तक ही सीमित नहीं है। इससे पहले आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी उत्तर प्रदेश में मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर इसी प्रकार की आशंकाएं और गंभीर आरोप दर्ज करा चुके हैं।
विभिन्न विपक्षी नेताओं के इन बयानों के बाद यह विषय राज्य के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी एक गरमा-गरम राजनीतिक बहस में तब्दील हो चुका है। विपक्षी दल इसे सीधे तौर पर चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता से जोड़कर देख रहे हैं और लगातार प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा के संदर्भ में भी कई दावे सामने आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने 16 लाख फॉर्म 6 जमा होने की बात स्वीकार की है। हालांकि, जानकारों और प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि फॉर्म का जमा होना और उनकी आवश्यक जांच-पड़ताल के बाद उन्हें विधिवत रूप से मंजूर किया जाना, दो बिल्कुल अलग चरण हैं। ऐसे में फॉर्म केवल जमा किए गए थे या उन्हें पूरी तरह स्वीकृति भी दे दी गई, इस पर स्थिति स्पष्ट होना अत्यंत आवश्यक है।
फिलहाल, फॉर्म 6 की वास्तविक स्थिति, उनकी स्वीकृति के आंकड़े और एसआईआर के दौरान लागू विशिष्ट कानूनी प्रावधानों को लेकर चुनाव आयोग के आधिकारिक और विस्तृत लिखित रुख का इंतजार किया जा रहा है, ताकि सामने आ रहे तमाम राजनीतिक दावों और आरोपों की असलियत साफ हो सके।



