
भारतीय रुपया गुरुवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 92.00 पर पहुंच गया। इंटरबैंक बाजार में रुपया 91.95 पर खुला और जल्द ही 92.00 तक फिसल गया। बुधवार को यह 91.99 पर बंद हुआ था, जो पहले का सबसे कमजोर क्लोजिंग था।
मुख्य कारण
- वैश्विक बाजारों में डॉलर की मजबूती और डॉलर इंडेक्स में तेजी।
- अमेरिकी फेडरल रिजर्व की तटस्थ ब्याज दर नीति से डॉलर को बल मिला।
- एशियाई मुद्राओं में कमजोरी और उभरते बाजारों पर दबाव।
- कच्चे तेल की कीमतों में 4% से ज्यादा की तेजी (ब्रेंट क्रूड 69.30 डॉलर प्रति बैरल), ईरान पर अमेरिकी चेतावनी के बाद।
- भारत बड़े तेल आयातक होने से ज्यादा प्रभावित।
- लगातार पूंजी निकासी और भू-राजनीतिक अनिश्चितता।
- ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर लगाए गए भारी टैरिफ से रुपया पिछले कुछ समय में करीब 5% गिर चुका है।
इस साल कितना गिरा रुपया?
2026 में अब तक रुपया लगभग 2% कमजोर हो चुका है।
विशेषज्ञों की राय
सीआर फॉरेक्स एडवाइजर्स के अमित पाबरी के अनुसार, पूंजी निकासी और तेल कीमतों की तेजी से दबाव बना हुआ है। अगर 92.00 स्तर टूटता है तो रुपया 92.20-92.50 तक जा सकता है। हालांकि, आरबीआई का संभावित हस्तक्षेप गिरावट को सीमित कर सकता है और इसे 91.00-91.20 के स्तर पर ला सकता है।
शेयर बाजार पर असर
बीएसई सेंसेक्स 344 अंक गिरकर 82,001 पर और निफ्टी 94 अंक टूटकर 25,248 पर कारोबार कर रहा था। हालांकि, FII ने बुधवार को 480 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे।
सकारात्मक खबर
दिसंबर 2025 में भारत का औद्योगिक उत्पादन 7.8% बढ़ा, जो दो साल से ज्यादा का उच्चतम स्तर है। विनिर्माण, खनन और बिजली क्षेत्रों में मजबूत प्रदर्शन रहा।



