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दिल्ली-एनसीआर में जहरीली हवा का कहर: 80% लोग बीमार, 79% शिफ्टिंग प्लान कर रहे, सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े

दिल्ली और उसके आसपास के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु प्रदूषण अब एक गंभीर स्वास्थ्य आपदा का रूप ले चुका है, जो लोगों के जीवन को पूरी तरह बदल रहा है। कंज्यूमर रिसर्च फर्म स्मिटन पल्सएआई द्वारा नवंबर 2025 में किए गए एक व्यापक सर्वे में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा, गाजियाबाद और फरीदाबाद के 4,000 निवासियों में से 80 प्रतिशत से अधिक लोग प्रदूषित हवा के कारण लगातार स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। यह सर्वे स्मॉग सीजन के चरम के दौरान आयोजित किया गया, जो शहर की हवा को एक अदृश्य दुश्मन के रूप में उजागर करता है।

सर्वे के अनुसार, अधिकांश प्रभावित लोग पुरानी खांसी, थकान और सांस लेने में जलन जैसी परेशानियों का शिकार हैं। पिछले एक वर्ष में 68.3 प्रतिशत लोगों को प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के इलाज के लिए चिकित्सा सहायता लेनी पड़ी, जो स्वास्थ्य संकट की गहराई को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंकड़ा सर्दियों में और बढ़ सकता है, जब एQI स्तर ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंच जाता है।

प्रदूषण का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है; यह जीवनशैली को भी बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। सर्वे में पाया गया कि 76.4 प्रतिशत लोग जहरीली हवा से बचने के लिए घरों में अधिक समय बिता रहे हैं और बाहर निकलने से परहेज कर रहे हैं। इससे उनके घर एक वर्चुअल कैदखाने में बदल गए हैं, जहां लोग एयर प्यूरीफायर और मास्क पर निर्भर होकर जी रहे हैं।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 79.8 प्रतिशत लोग दिल्ली-एनसीआर से स्थानांतरित होने पर विचार कर रहे हैं या पहले ही चले गए हैं। इनमें से 33.6 प्रतिशत गंभीरता से शिफ्टिंग की योजना बना रहे हैं, जबकि 37 प्रतिशत ने पहले ही कदम उठा लिए हैं – जैसे अन्य शहरों में संपत्ति खरीदना, स्कूलों में पूछताछ करना या परिवार के साथ फैसला लेना। पसंदीदा जगहें पहाड़ी इलाके, छोटे शहर या कम औद्योगिक क्षेत्र हैं, जहां साफ हवा उपलब्ध है। स्मिटन पल्सएआई के सह-संस्थापक स्वागत सरंगी ने कहा, “यह अध्ययन दर्शाता है कि लंबे समय तक खराब वायु गुणवत्ता रोजमर्रा की जिंदगी को बदल रही है – स्वास्थ्य व्यवहार, खर्च पैटर्न और लंबी अवधि के फैसलों को प्रभावित कर रही है।”

प्रदूषण का आर्थिक बोझ भी कम नहीं है। सर्वे में 85.3 प्रतिशत लोगों ने बताया कि प्रदूषण के कारण उनके घरेलू खर्च बढ़ गए हैं, जैसे एयर प्यूरीफायर, मास्क और दवाओं पर अतिरिक्त व्यय। वहीं, 41.6 प्रतिशत को वित्तीय तंगी का सामना करना पड़ रहा है, जो मध्यम वर्ग के परिवारों को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है। सरंगी ने इसे “प्रदूषण कर” करार दिया, जो शिक्षा या किराने जैसे जरूरी खर्चों पर असर डाल रहा है।

यह सर्वे दिल्ली-एनसीआर को एक घेराबंदी वाले शहर के रूप में चित्रित करता है, जहां हवा ही सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत है, अन्यथा यह प्रवास की लहर को और तेज कर देगा।

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