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भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि नवीनीकरण: संयुक्त मापन शुरू, दिसंबर 2026 में समाप्त होगी मौजूदा संधि

भारत और बांग्लादेश ने 1996 की गंगा जल साझेदारी संधि के नवीनीकरण की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू कर दी है। 1 जनवरी 2026 से दोनों देशों की टीमों ने गंगा (भारत में फरक्का पॉइंट) और पद्मा नदी (बांग्लादेश में हार्डिंग ब्रिज से 3500 फीट ऊपर) पर संयुक्त जल स्तर मापन शुरू किया है। यह मापन हर 10 दिन में होगा और 31 मई तक चलेगा, ताकि सूखे मौसम (जनवरी-मई) में जल उपलब्धता का सटीक आकलन हो सके।

यह संधि दिसंबर 2026 में 30 साल पूरे होने पर समाप्त हो जाएगी। नवीनीकरण के लिए दोनों देशों की सहमति जरूरी है, अन्यथा यह स्वतः खत्म हो जाएगी।

संधि का ऐतिहासिक संदर्भ
12 दिसंबर 1996 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इसका मुख्य उद्देश्य फरक्का बैराज पर सूखे मौसम में गंगा जल का बंटवारा था। भारत ने 1975 में फरक्का बैराज बनाया था ताकि हुगली नदी में जल प्रवाह बनाए रखकर कोलकाता बंदरगाह को सिल्टेशन से बचाया जा सके, लेकिन इससे बांग्लादेश में जल की कमी की शिकायतें बढ़ीं।

संधि के तहत जल बंटवारा 1949-1988 के ऐतिहासिक डेटा पर आधारित है:

  • फरक्का पर प्रवाह 70,000 क्यूसेक से कम होने पर दोनों देशों में बराबर बंटवारा।
  • 70,000 से ऊपर होने पर भारत को पहले निर्धारित मात्रा, शेष बांग्लादेश को।

दोनों देशों की चिंताएं
बांग्लादेश का आरोप है कि संधि भारत के पक्ष में है और सूखे महीनों (खासकर मार्च-मई) में उसे कम जल मिलता है। वह जलवायु परिवर्तन, बाढ़-सूखा और सुंदरबन इकोसिस्टम को ध्यान में रखते हुए लंबी अवधि (30 साल) का नवीनीकरण चाहता है, साथ ही अधिक पारदर्शिता और तीस्ता जैसे अन्य नदियों को शामिल करने की मांग कर रहा है।

भारत का पक्ष है कि संधि अब तक संयुक्त नदी आयोग के माध्यम से सफल रही है। वह घरेलू जरूरतों (सिंचाई, बिजली, नेविगेशन) और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए छोटी अवधि (10-15 साल) का नया समझौता चाहता है। पश्चिम बंगाल की चिंताओं (बाढ़, कटाव) को भी ध्यान में रखना होगा, क्योंकि राज्य की सहमति जरूरी है।

आगे की राह
दोनों पक्षों में विश्वास की कमी और राजनीतिक तनाव के बावजूद, संयुक्त मापन सकारात्मक कदम है। नवीनीकरण जलवायु अनुकूल, डेटा-आधारित और दोनों की जरूरतों को संतुलित करने वाला होना चाहिए। असफलता से क्षेत्रीय तनाव बढ़ सकता है।

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