काम के बाद फोन-मेल से मुक्ति: लोकसभा में पेश हुआ ‘राइट टू डिस्कनेक्ट बिल 2025’, कर्मचारियों को मिलेगा ऑफिस टाइम के बाहर ‘नो’ कहने का कानूनी हक
काम के बाद लगातार फोन, व्हाट्सएप और ईमेल से परेशान कर्मचारियों को राहत देने वाला प्राइवेट मेंबर बिल शुक्रवार को लोकसभा में पेश कर दिया गया। एनसीपी (शरदचंद्र पवार) सांसद सुप्रिया सुले ने ‘द राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2025’ पेश किया, जिसमें कर्मचारियों को ऑफिस टाइम खत्म होने के बाद और छुट्टियों में काम से जुड़े कॉल-मेल का जवाब न देने का पूरा कानूनी अधिकार देने का प्रस्ताव है।
बिल में प्रमुख प्रावधान:
- हर कर्मचारी को काम के घंटों के बाहर और अवकाश के दिनों में काम से पूरी तरह ‘डिस्कनेक्ट’ होने का अधिकार।
- बॉस या कंपनी द्वारा भेजे गए मैसेज-कॉल का जवाब न देने पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।
- कर्मचारी कल्याण प्राधिकरण (Employees’ Welfare Authority) का गठन, जो शिकायतों का निपटारा करेगा।
सुप्रिया सुले ने कहा कि लगातार वर्क-फ्रॉम-होम कल्चर और डिजिटल दबाव ने कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित किया है। यह बिल फ्रांस, बेल्जियम, इटली जैसे देशों के मॉडल पर आधारित है, जहां ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ कानून पहले से लागू है।
इसी सत्र में पेश हुए अन्य महत्वपूर्ण प्राइवेट बिल
- कांग्रेस सांसद कडियम काव्या और एलजेपी (रामविलास) सांसद शंभवी चौधरी ने अलग-अलग मासिक धर्म लाभ बिल पेश किए। दोनों में महिलाओं को पेड पीरियड लीव, कार्यस्थल पर सैनिटरी सुविधाएं और स्वास्थ्य लाभ देने की मांग।
- डीएमके सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने पूरे देश में मृत्युदंड खत्म करने वाला बिल पेश किया।
- कांग्रेस सांसद माणिकम टैगोर ने तमिलनाडु को नीट परीक्षा से छूट देने वाला बिल पेश किया (राज्य सरकार का विधेयक राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया था)।
- निर्दलीय सांसद विशालदादा पाटिल ने पत्रकारों पर हिंसा रोकने और उनकी सुरक्षा के लिए अलग कानून का बिल पेश किया।
हालांकि प्राइवेट मेंबर बिल का पास होना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन ये बिल संसद में इन मुद्दों पर बहस छेड़ने और जनता का ध्यान खींचने में सफल रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ अगर कानून बना तो यह भारत में वर्क-लाइफ बैलेंस के लिए ऐतिहासिक कदम होगा।