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‘क्या मुर्गियों और बकरियों की जान नहीं होती?’: आवारा कुत्तों के पक्ष में याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के मामले में पशु प्रेमियों की दलीलों पर पशु कल्याण की चयनात्मक चिंता पर सवाल उठाया। कोर्ट ने पूछा कि क्या मुर्गियों और बकरियों की जान नहीं होती, क्योंकि वे भी जीवित प्राणी हैं। यह टिप्पणी कुत्तों के हटाए जाने के खिलाफ याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई।

चयनात्मक पशु प्रेम पर कोर्ट का सवाल
आवारा कुत्तों और मवेशियों से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच (जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया) ने पशु कल्याण के नैतिक तर्कों की जांच की। पशु प्रेमियों की ओर से दलीलें दी गईं कि कुत्तों को हटाना गलत है, क्योंकि वे भी जीव हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि क्या यह चिंता केवल कुत्तों तक सीमित है? मुर्गियां और बकरियां जैसे अन्य जानवरों की जान का क्या, जो रोजाना बलि चढ़ाए जाते हैं?

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि “कुत्ता कब काटने के मूड में होगा, यह कोई नहीं जान सकता।” बेंच ने राजमार्गों पर आवारा जानवरों से होने वाले हादसों पर गंभीर चिंता जताई और हाल के मामलों का जिक्र किया, जहां जजों की गाड़ियां भी टकराईं।

मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 28 जुलाई 2025 को स्वतः संज्ञान से शुरू हुआ, जब दिल्ली में कुत्तों के काटने से बच्चों में रैबीज की घटनाएं बढ़ीं। 7 नवंबर 2025 को कोर्ट ने संस्थागत क्षेत्रों (स्कूल, अस्पताल आदि) से कुत्तों को हटाकर आश्रय गृहों में रखने के निर्देश दिए थे, और उन्हें मूल जगह पर वापस न छोड़ने को कहा था।

सुनवाई में बड़ी संख्या में याचिकाएं दाखिल होने पर कोर्ट ने हैरानी जताई कि “इतनी अर्जियां तो इंसानों के मामलों में भी नहीं आतीं।” कोर्ट ने दोनों पक्षों—पशु प्रेमियों और पीड़ितों—की बात सुनने का आश्वासन दिया।

यह टिप्पणी पशु अधिकारों और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन की बहस को उजागर करती है। सुनवाई जारी है, और कोर्ट राज्यों से अनुपालन रिपोर्ट मांग रहा है।

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