बिहार मतदाता सूची विवाद: चुनाव आयोग का दावा- कोई आपत्ति नहीं, तेजस्वी यादव बोले- जनता करेगी हिसाब
बिहार में विशेष गहन संशोधन (SIR) के तहत मतदाता सूची के प्रारूप प्रकाशन के बाद सियासी घमासान जारी है। चुनाव आयोग ने शुक्रवार को दैनिक बुलेटिन जारी कर कहा कि 1 अगस्त को जारी प्रारूप मतदाता सूची में त्रुटियों को सुधारने के लिए दावे और आपत्तियाँ दर्ज करने की अवधि 1 सितंबर तक है।

आयोग ने दावा किया कि अब तक किसी भी राजनीतिक दल ने एक भी आपत्ति दर्ज नहीं कराई है। साथ ही, जिन मतदाताओं के नाम छूट गए हैं, वे कैंप में जाकर या निर्धारित प्रपत्र (फॉर्म 6) जमा कर अपनी समस्या का समाधान करवा सकते हैं। आयोग ने यह भी सुनिश्चित किया कि कोई भी नाम बिना कारण के अंतिम सूची से नहीं हटाया जाएगा।
बिहार में मतदाता सुविधा के लिए आयोग ने कई कदम उठाए हैं। बूथ पर मतदाताओं की संख्या को 1,200 तक सीमित कर बिहार देश का पहला राज्य बन गया है। मतदान केंद्रों की संख्या 77,895 से बढ़ाकर 90,712 और बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) की संख्या भी इतनी ही कर दी गई है। स्वयंसेवकों की संख्या 1 लाख से बढ़ाकर लगभग 1.5 लाख की जा रही है। सभी 12 मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों ने अपने बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) की संख्या 1,38,680 से बढ़ाकर 1,60,813 कर दी है।
हालांकि, प्रारूप सूची में 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने से विवाद गहरा गया है। इनमें पटना (3,95,500), मधुबनी (3,52,545), पूर्वी चंपारण (3,16,793), गोपालगंज (3,10,363), समस्तीपुर (2,83,955), मुजफ्फरपुर (2,82,845), सारण (2,73,223), गया (2,45,663), वैशाली (2,25,953), और दरभंगा (2,03,315) जैसे जिले शीर्ष पर हैं। सबसे कम हटाए गए नाम शेखपुरा (26,256), अरवल (30,180), और लखीसराय (48,824) में हैं। आयोग का दावा है कि इनमें 22 लाख मृत, 7 लाख डुप्लिकेट, और 36 लाख प्रवासी या अनट्रेसेबल मतदाता हैं।
विपक्षी नेता और राजद के तेजस्वी यादव ने इस प्रक्रिया पर तीखा हमला बोला। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि उनका नाम भी प्रारूप सूची से गायब था, हालांकि आयोग ने इसे खारिज करते हुए कहा कि उनका नाम सीरियल नंबर 416 पर दर्ज है। तेजस्वी ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि 65 लाख नाम हटाने का आधार क्या है। उन्होंने पूछा कि मृत मतदाताओं के परिजनों से कौन सा दस्तावेज लिया गया, और 36 लाख मतदाताओं को प्रवासी घोषित करने का मानदंड क्या था। उन्होंने कहा कि अगर अस्थायी प्रवास के आधार पर नाम कटे, तो बिहार के 3 करोड़ पंजीकृत प्रवासी श्रमिकों का आंकड़ा इससे कहीं अधिक होना चाहिए। तेजस्वी ने इसे लोकतंत्र और संविधान के साथ विश्वासघात करार देते हुए कहा कि “नैतिक रूप से भ्रष्ट” अधिकारियों का जनता “इलाज” करेगी।
तेजस्वी ने यह भी बताया कि राजद ने सभी जिलाध्यक्षों, विधायकों, और विधानपार्षदों के साथ प्रारूप सूची की विसंगतियों पर चर्चा की है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र से 20,000-30,000 नाम हटाए गए हैं, और आयोग ने हटाए गए मतदाताओं के पते, बूथ नंबर, या EPIC नंबर जैसे विवरण साझा नहीं किए, जिससे पारदर्शिता का अभाव है। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने भी दावा किया कि विपक्षी गढ़ों जैसे गोपालगंज (15.10%), पूर्णिया (12.07%), किशनगंज (11.82%), मधुबनी (10.44%), और भागलपुर (10.19%) में नाम हटाने की दर अधिक है, खासकर दलित, मुस्लिम, और प्रवासी समुदायों की।
आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि SIR प्रक्रिया पारदर्शी है और 2003 के बाद पहली बार व्यापक संशोधन किया गया है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि 7.89 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से 7.24 करोड़ ने गणना फॉर्म जमा किए, और शेष को दावे-आपत्ति अवधि में शामिल होने का मौका है। बावजूद इसके, विपक्षी दलों ने 9 जुलाई को पटना में बिहार बंद और संसद में चर्चा की मांग की। तेजस्वी ने चेतावनी दी कि अगर मुद्दे का समाधान नहीं हुआ, तो चुनाव बहिष्कार का विकल्प खुला है।
यह विवाद बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले चुनावी माहौल को गर्मा रहा है। आयोग की प्रक्रिया और विपक्ष के आरोप लोकतंत्र की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं।