
सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार और अधिकार क्षेत्र अदालत को है।
यह टिप्पणी बुधवार को नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के सामने हुई सुनवाई के दौरान आई। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया था कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत यह फैसला नहीं कर सकती क्योंकि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं। मेहता ने कहा कि ऐसी प्रथाओं में सुधार करने का अधिकार विधायिका का है, न कि अदालत का।
जवाब में न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि अदालत के पास यह तय करने का पूरा अधिकार है कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके बाद क्या कदम उठाए जाएं, यह विधायिका का काम है, लेकिन अदालत को यह कहकर नहीं रोका जा सकता कि केवल विधायिका ही अंतिम फैसला करेगी।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने पूछा कि अगर जादू-टोना को धार्मिक प्रथा माना जाए तो क्या उसे अंधविश्वास नहीं कहा जाएगा? उन्होंने यह भी सवाल किया कि अगर विधायिका चुप है तो क्या अदालत अनुच्छेद 32 के तहत स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था को ध्यान में रखकर ऐसी प्रथा पर रोक लगा सकती है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि किसी धर्म की आवश्यक प्रथा तय करते समय अदालत को उस धर्म की फिलॉसफी के नजरिए से देखना चाहिए, न कि किसी दूसरे धर्म के विचार थोपने चाहिए।
यह सुनवाई 2018 के सबरीमाला फैसले के बाद धर्म के भीतर अंधविश्वास की परिभाषा और अदालत के अधिकार क्षेत्र पर हो रही है।



