
अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में भारत की प्रतिक्रिया ने दशकों पुरानी संतुलित विदेश नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत ने न तो ईरान पर अमेरिका-इज़राइल के हमलों की निंदा की, न ही ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या पर कोई शोक या विरोध जताया। इस चुप्पी को विशेषज्ञ और विपक्ष तटस्थता नहीं, बल्कि इज़राइल पक्ष में झुकाव मान रहे हैं।
दशकों से भारत की मिडिल ईस्ट नीति का आधार रहा है कि वह इज़राइल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखे। लेकिन अब जब दो रणनीतिक साझेदार सीधे युद्ध में उलझे हैं, तो भारत की चुप्पी को पक्ष चुनने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इज़राइल यात्रा के ठीक बाद यह घटनाक्रम हुआ, जिससे भारत की तटस्थ छवि पर सवाल और गहरे हो गए हैं।
प्रधानमंत्री ने UAE के राष्ट्रपति से बात की और ईरानी मिसाइल हमलों की कड़ी निंदा की, जबकि इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बात में ‘शत्रुता जल्द समाप्त करने’ की अपील की। लेकिन ईरान से कोई बातचीत नहीं हुई, जहां भारत ने चाबहार बंदरगाह में भारी निवेश किया है। इन बातचीतों को अंग्रेजी, अरबी और हिब्रू में पोस्ट किया गया, लेकिन ईरान का जिक्र नहीं।
विपक्ष ने इसे ईरान के साथ ‘धोखा’ बताया है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि यह ईरान के साथ विश्वासघात है, जबकि जयराम रमेश ने ‘नैतिक कायरता’ का आरोप लगाया। सोनिया गांधी ने अपने लेख में चुप्पी को ‘त्यागपत्र’ करार दिया और कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन का मौन समर्थन है।



