
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को बाद में धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने कहा कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं, तो संबंध टूट जाने मात्र से वह अपराध नहीं बन जाता। मामले की सुनवाई के दौरान, अदालत ने स्पष्ट किया कि असफल रिश्ते के बाद होने वाली निराशा या भावनात्मक आघात को धोखा या कपट नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थितियां व्यक्तिगत संबंधों का हिस्सा हैं, न कि आपराधिक कृत्य।
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 केवल तभी लागू होती है जब कोई संबंध स्पष्ट धोखे से बना हो, जैसे कि बेईमानी से किया गया विवाह का झूठा वादा। यह कानून उन मामलों पर लागू नहीं होता जहां आपसी सहमति से बना संबंध दुखद अंत के साथ समाप्त होता है। धारा 69 के तहत धोखाधड़ी या छल के माध्यम से संबंध बनाने के दोषी पाए जाने पर 10 वर्ष तक की कारावास की सजा का प्रावधान है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की खंडपीठ ने मामले में एफआईआर रद्द करने का आदेश देते हुए ये टिप्पणियां कीं।
यह मामला नोएडा का है। एक युवती ने सेक्टर-63 पुलिस स्टेशन में एक युवक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें उस पर धमकी देने, मारपीट करने और शादी का झूठा वादा करके संबंध बनाने (धारा-69) का आरोप लगाया गया । आरोपी युवक ने एफआईआर रद्द करने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान युवक के वकील ने अदालत को बताया कि युवती और आरोपी युवक ने जोधपुर में एक साथ एलएलएम की पढ़ाई की थी। दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने शादी की तैयारियां शुरू कर दी थीं। बाद में, किसी कारणवश, उनके रिश्ते में दरार आ गई। उनके बीच मतभेद पैदा हो गए। अदालत ने पाया कि शादी का वादा सच्चा था। इसे पूर्वव्यापी रूप से धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।



