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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बिना पेनेट्रेशन ‘रेप’ नहीं, ‘रेप का प्रयास है’ आरोपी की सजा हुई आधी…!

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि यौन हमले के दौरान यदि ‘पेनिट्रेशन’ नहीं होता है, तो केवल ‘इजैकुलेशन’ को दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने इसे ‘दुष्कर्म का प्रयास’ मानते हुए आरोपी की सजा को सात साल से घटाकर साढ़े तीन साल कर दिया है।

यह मामला धमतरी जिले के वर्ष 2004 का है, जिसमें निचली अदालत ने आरोपी वासुदेव गोंड को धारा 376(1) के तहत दोषी ठहराया था। न्यायमूर्ति व्यास ने साक्ष्यों और पीड़िता के बयानों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए पाया कि घटना के समय पूर्ण या आंशिक प्रवेश के पुख्ता सबूत नहीं थे। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 375 (2013 के संशोधन से पहले) के तहत ‘पेनिट्रेशन’ अनिवार्य शर्त है।

न्यायालय ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि आरोपी द्वारा पीड़िता को कमरे में ले जाना और निर्वस्त्र करना ‘तैयारी’ की सीमा पार कर ‘प्रयास’ के चरण में आता है। ऐसे में आरोपी को धारा 376 के साथ पठित धारा 511 (अपराध का प्रयास) के तहत दोषी माना गया। जस्टिस व्यास ने टिप्पणी की कि कानूनी परिभाषाओं के अनुसार, मामूली प्रवेश के अभाव में आरोपी को दुष्कर्म का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, भले ही कृत्य कितना भी गंभीर क्यों न हो।

बतादें, 2005 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को 7 साल की सजा दी थी। हाईकोर्ट ने इसे धारा 511 के साथ धारा 375 के तहत प्रयास मानकर सजा घटाकर तीन साल छह महीने कर दी। आरोपी को दो महीने में सरेंडर करना होगा और जेल में बिताया समय सेट-ऑफ मिलेगा। यह फैसला 2004 के समय लागू कानून पर आधारित है।

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