
भारत-ईरान संबंध लंबे समय से तेहरान-वाशिंगटन रिश्तों के भरोसे रहे हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों, खासकर ईरानी तेल और उसके साथ व्यापार करने वाली संस्थाओं पर लगाए गए सेकेंडरी सैंक्शंस ने भारत को बुरी तरह प्रभावित किया है। इससे ऊर्जा व्यापार लगभग ठप हो गया और रणनीतिक परियोजनाएं, खासकर चाबहार बंदरगाह, बार-बार रुक गईं।
अब ईरान में विरोध प्रदर्शनों का जोर बढ़ने, सरकार की कठोर कार्रवाई से कम से कम 2500 लोगों की मौत और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई सैन्य कार्रवाई की चेतावनी के बीच, चाबहार परियोजना पर फिर से संकट मंडरा रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए हैं, जिसके चलते भारत चाबहार परियोजना से चुपचाप पीछे हट रहा है। हालांकि, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने शुक्रवार को साप्ताहिक ब्रीफिंग में इन दावों का खंडन किया। उन्होंने कहा, “28 अक्टूबर को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने अप्रैल 2026 तक वैध सशर्त प्रतिबंध छूट की गाइडलाइंस जारी की थीं। हम अमेरिका के साथ इस व्यवस्था को लेकर बातचीत जारी रखे हुए हैं।” इस छूट के कारण ही इंडियन पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड ईरान के साथ 10 साल के समझौते के तहत बंदरगाह का प्रबंधन जारी रख पा रहा है।
जायसवाल ने भारत-ईरान के लंबे समय से चले आ रहे साझेदारी पर जोर देते हुए कहा कि नई दिल्ली ईरान में बदलती स्थिति पर बारीकी से नजर रख रही है। भारत ने अपने नागरिकों को ईरान यात्रा न करने की सलाह दी है और वहां रह रहे लगभग 9,000 भारतीयों से तुरंत वापस लौटने को कहा है, जब तक व्यावसायिक उड़ानें उपलब्ध हैं।
चाबहार से 120 मिलियन डॉलर ट्रांसफर की अफवाह
कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि भारत ने चाबहार परियोजना में दिए गए 120 मिलियन डॉलर का भुगतान ईरान को ट्रांसफर कर दिया है ताकि परियोजना से जुड़े जोखिम से बचा जा सके। हालांकि, जायसवाल ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की और सिर्फ अमेरिका के साथ छूट की बातचीत पर जोर दिया।
चाबहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा और ईरानी समकक्ष हसन रूहानी के बीच चाबहार परियोजना की चर्चा शुरू हुई। यह भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापार मार्ग खोलने का सुनहरा अवसर था, क्योंकि पाकिस्तान भारत को अपनी जमीन से अफगानिस्तान जाने की अनुमति नहीं देता। 2003 में तत्कालीन ईरानी राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रणनीतिक सहयोग का रोडमैप साइन किया और चाबहार इसका केंद्रबिंदु बना।
भारत ने अफगानिस्तान में जरंज-देलाराम हाईवे का निर्माण किया, जो 2009 में पूरा हुआ। इस दौरान भारतीय मजदूरों पर तालिबान ने कई हमले किए। लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अमेरिका-ईरान संबंधों की खटास और 2018 में ट्रंप द्वारा ईरान न्यूक्लियर डील से बाहर होने के कारण परियोजना बार-बार ठप हुई।
वर्तमान संकट
ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और अमेरिकी दबाव के बीच भारत को अपने क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं और अमेरिका के साथ संबंधों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। पिछले साल भारत-अमेरिका संबंधों को झटका लगा था, और अब ट्रंप की 50% टैरिफ बढ़ोतरी के साथ 25% अतिरिक्त सैंक्शंस की धमकी भारत के लिए चुनौती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नई दिल्ली ट्रंप को और नाराज नहीं करना चाहेगी और ईरान के साथ रिश्तों को बलिदान देने को तैयार हो सकती है।