गेहूं सहायता लेने से चावल निर्यातक बनने तक: अमेरिकी पटकथा को कैसे भारत ने उलट दिया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारतीय चावल पर ‘डंपिंग’ का आरोप लगाते हुए नए टैरिफ लगाने की धमकी के बीच यह याद रखना प्रासंगिक है कि पिछले कुछ दशकों में अमेरिका-भारत के खाद्य संबंध कितने नाटकीय रूप से बदल चुके हैं।
एक समय कम गुणवत्ता वाले अमेरिकी गेहूं पर निर्भर भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक बन चुका है, जो अमेरिकी चावल आयात का लगभग एक चौथाई हिस्सा आपूर्ति करता है। ट्रंप ने किसानों के दबाव में 12 अरब डॉलर की सहायता पैकेज की घोषणा करते हुए कहा कि भारत जैसे देश सस्ते दामों पर चावल बेचकर अमेरिकी बाजार को नुकसान पहुंचा रहे हैं। लेकिन यह उलटफेर भारत की कृषि क्रांति की कहानी है, जहां 1960 के दशक में अमेरिकी सहायता पर निर्भर देश आज निर्यातक बन गया है।
‘डंपिंग’ का मतलब और अमेरिकी दबाव
‘डंपिंग’ से तात्पर्य है कि कोई देश अपनी अधिशेष उपज या उत्पाद को बहुत कम दामों पर बेचकर आयातक देश के बाजार को बाधित करता है। ट्रंप ने व्हाइट हाउस में किसान प्रतिनिधियों के साथ बैठक में कहा कि भारत, थाईलैंड और चीन जैसे देश सस्ते चावल आयात कर अमेरिकी किसानों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने पुष्टि की कि भारत को कोई विशेष छूट नहीं है, लेकिन व्यापार समझौते पर बातचीत जारी है। अगस्त 2025 से भारत पर 50% टैरिफ लग चुका है, जो व्यापार बाधाओं और रूसी तेल खरीद पर था। फिर भी, 2024-25 में भारत ने अमेरिका को 3.80 अरब डॉलर का चावल निर्यात किया, जो कुल आयात का 25% है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं को ही नुकसान होगा, क्योंकि भारतीय चावल की कीमतें प्रतिस्पर्धी हैं।
अमेरिकी प्लेट पर चावल का बढ़ता वर्चस्व
1960 के दशक में जब अमेरिका भारत को गेहूं भेज रहा था, तब अमेरिकी आहार में चावल का स्थान सीमित था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। यूएसडीए के आंकड़ों के अनुसार, 1970 में प्रति व्यक्ति चावल खपत 5.2 किग्रा सालाना थी, जो 2023-24 में 11.8 किग्रा हो गई—यानी दोगुनी से अधिक। कारण: एशियाई और हिस्पैनिक आबादी का बढ़ना (जो चावल अधिक खाती है), ग्लूटेन-फ्री ट्रेंड और नए चावल उत्पाद।
अमेरिका खुद 9 मिलियन टन चावल उत्पादन करता है, लेकिन आयात 25% से अधिक है, जो 2001 से तिगुना हो गया। 2024 में कुल आयात 1.61 अरब डॉलर का था, जिसमें भारत का हिस्सा 380 मिलियन डॉलर (बासमती का 337 मिलियन) था। मुख्य आपूर्तिकर्ता: भारत, थाईलैंड, पाकिस्तान, फिलीपींस और चीन।
1960 का संकट: भूखमरी और अमेरिकी सहायता का ‘ब्लैकमेल’
स्वतंत्रता के बाद भारत गरीबी और भुखमरी से जूझ रहा था। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दो सदीय प्रभाव से कृषि ठहरावग्रस्त थी—उपज कम, मिट्टी क्षीण और किसान कर्जदार। 1960 के मध्य तक औसत भारतीय रोजाना मात्र 417 ग्राम भोजन पर गुजारा कर रहा था, जबकि सामान्य वयस्क को 1.5-2.5 किग्रा की जरूरत होती है। नेहरू ने गेहूं की जगह शकरकंद अपनाने की अपील की। चावल, जो मुख्य आहार था, कमी से ग्रस्त हो गया।
1965 की मानसून विफलता ने संकट गहरा दिया—उत्पादन 89 मिलियन टन से घटकर 72.3 मिलियन टन रह गया। बिहार में अकाल से 2,500 मौतें हुईं। इंदिरा गांधी सरकार ने अमेरिकी पब्लिक लॉ 480 (PL-480) ‘फूड फॉर पीस’ कार्यक्रम से 10 मिलियन टन से अधिक गेहूं आयात किया। यह ‘शिप टू माउथ’ युग था, जहां जहाजों का इंतजार ही जीवनरेखा था। लेकिन सहायता कम गुणवत्ता वाली थी—पशु चारे लायक लाल गेहूं (‘लाल गेहूं’), जो कठोर रोटियां बनाता था। इसमें पार्थेनियम बीज भी थे, जो ‘कांग्रेस घास’ नाम से घास का खतरा बन गया।
अमेरिका ने सहायता को हथियार बनाया। लिंडन जॉनसन प्रशासन ने वियतनाम नीति पर भारत की आलोचना के बदले शिपमेंट रोके। इंदिरा गांधी को वाशिंगटन जाकर कृषि सुधारों का आश्वासन देना पड़ा।
हरित क्रांति: निर्भरता से आत्मनिर्भरता तक
1966 की कमी ने इंदिरा सरकार को हरित क्रांति अपनाने पर मजबूर किया। एम.एस. स्वामीनाथन (हरित क्रांति के पिता) के नेतृत्व में मैक्सिकन गेहूं किस्मों को अनुकूलित किया गया। नॉर्मन बोरलॉग (नोबेल विजेता) ने उच्च उपज वाली किस्में दीं। सिंचाई, रासायनिक उर्वरक, यंत्र (ट्रैक्टर, थ्रेशर) और MSP जैसी नीतियों से गेहूं उत्पादन 1960 के 10 मिलियन टन से 1974 तक आत्मनिर्भर हो गया। चावल उत्पादन भी दोगुना हो गया, खासकर पश्चिम बंगाल में।
पटकथा का उलटफेर: निर्यातक भारत
हरित क्रांति ने भारत को ‘शिप टू माउथ’ से मुक्त किया। 1990 के दशक से गेहूं-चावल निर्यात शुरू हुआ। 2020-21 में कृषि निर्यात 3.5 अरब डॉलर का था। 2024-25 में अमेरिका को कृषि निर्यात 1.93 अरब डॉलर का, जिसमें बासमती (337 मिलियन), अनाज प्रीपरेशंस (161 मिलियन) और दालें (66 मिलियन) शामिल। भारत 22 मिलियन टन से अधिक चावल निर्यात करता है, जो वैश्विक उत्पादन का 28% है। आज भारत 120 से अधिक देशों को निर्यात करता है और PDS के जरिए 80 करोड़ लोगों को खिलाता है। कभी सहायता लेने वाला देश अब जरूरतमंदों को भेजता है।
ट्रंप की धमकी के बीच 1960 का इतिहास याद दिलाता है कि कैसे भारत ने कठिनाइयों से उबरकर पटकथा उलट दी।