
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संगठन में बड़े बदलाव की कवायद तेज हो गई है। लंबे समय से खाली पड़े प्रदेश अध्यक्ष पद पर नए चेहरे की नियुक्ति अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी का कार्यकाल जनवरी 2024 में समाप्त हो चुका था, और उसके बाद से यह महत्वपूर्ण पद रिक्त है।
हालिया बिहार विधानसभा चुनावों में पार्टी की मजबूत प्रदर्शन के बाद, भाजपा ने यूपी पर फोकस बढ़ा दिया है। 2026 के पंचायत चुनावों और 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए, नए अध्यक्ष की नियुक्ति को रणनीतिक महत्व दिया जा रहा है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, नियुक्ति दिसंबर 2025 या जनवरी 2026 की शुरुआत में हो सकती है, ताकि खरमास (16 दिसंबर 2025 से 14 जनवरी 2026) से पहले शुभ कार्य पूरे हो सकें।
जिला स्तर पर बदलाव: 84 अध्यक्ष नियुक्त, 14 जिलों में लंबित
पार्टी ने संगठन को मजबूत करने के लिए जिला स्तर पर भी फेरबदल तेज कर दिया है। बुधवार को 14 नए जिला अध्यक्षों के नाम घोषित किए गए, जिससे कुल 84 जिला/नगर इकाइयों के प्रमुख नियुक्त हो चुके हैं। इनमें ओबीसी समुदाय से बड़ी संख्या में नाम शामिल हैं, जो समाजवादी पार्टी के PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले का मुकाबला करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अभी भी 14 संगठनात्मक जिलों (जैसे वाराणसी, अयोध्या, सहारनपुर, अम्बेडकरनगर, चंदौली) में नियुक्तियां लंबित हैं। इन जिलों के अध्यक्षों के चुनाव के बाद ही प्रदेश अध्यक्ष का चयन होगा, जो या तो चुनाव प्रक्रिया से या केंद्रीय नेतृत्व के नामांकन से होगा।
भाजपा प्रवक्ता हीरो बाजपेयी ने कहा, “नियुक्ति में अब ज्यादा देरी नहीं होगी। जिला अध्यक्षों का चयन पूरा होते ही प्रदेश स्तर पर फैसला हो जाएगा।” यह बदलाव 2024 लोकसभा चुनावों के खराब प्रदर्शन के बाद संगठन को पुनर्जनन देने का प्रयास है।
संभावित उम्मीदवार: ओबीसी चेहरा सबसे आगे, जातिगत समीकरण पर जोर
नए प्रदेश अध्यक्ष के चयन में जातिगत प्रतिनिधित्व, संगठनात्मक अनुभव, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से तालमेल और प्रदेश संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह से निकटता जैसे कारक निर्णायक होंगे। पार्टी का एक बड़ा वर्ग ओबीसी नेता को प्राथमिकता देना चाहता है, ताकि गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोट बैंक मजबूत हो।
| वर्ग | संभावित नाम | पृष्ठभूमि/मजबूती |
|---|---|---|
| ओबीसी | धर्मपाल सिंह | यूपी मंत्री, संगठन मंत्री से निकटता, 1996 से विधायक |
| ओबीसी | बीएल वर्मा | केंद्रीय राज्य मंत्री (ओबीसी कोटा) |
| ओबीसी | स्वतंत्र देव सिंह | पूर्व विधायक, ओबीसी मजबूत आधार |
| ओबीसी | बाबूराम निषाद | निषाद समुदाय से, पिछड़े वर्ग फोकस |
| ओबीसी | अमरपाल मौर्य | राज्यसभा सांसद, दिल्ली-UP कमांड से जुड़े |
| दलित | रामशंकर कठेरिया | पूर्व केंद्रीय मंत्री |
| दलित | विद्या सागर सोनकर | एमएलसी, दलित समीकरण मजबूत |
| ब्राह्मण | दिनेश शर्मा | पूर्व डिप्टी सीएम |
| ब्राह्मण | हरीश द्विवेदी | पूर्व बस्ती सांसद |
| ब्राह्मण | गोविंद नारायण शुक्ला | प्रदेश महासचिव, हालिया उभार |
ओबीसी उम्मीदवारों को प्राथमिकता इसलिए दी जा रही है क्योंकि जिला अध्यक्षों की सूची में भी ओबीसी प्रतिनिधित्व बढ़ा है। पार्टी सवर्ण पकड़ बरकरार रखते हुए पिछड़े वर्गों पर फोकस कर रही है, जो पिछले एक दशक से यूपी की राजनीति में कारगर साबित हुआ है।
राजनीतिक संदर्भ: पंचायत चुनाव की तैयारी, कैबिनेट विस्तार की अटकलें
यह नियुक्ति केवल संगठनिक नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का हिस्सा है। बिहार चुनावों में पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सफलता ने यूपी में उत्साह जगाया है। केंद्रीय नेतृत्व अब राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के उत्तराधिकारी के साथ-साथ राज्य स्तर पर बदलाव पर ध्यान दे रहा है। माना जा रहा है कि नए अध्यक्ष के साथ योगी कैबिनेट में विस्तार या फेरबदल भी हो सकता है, ताकि जातिगत संतुलन बने। भाजपा का लक्ष्य 2027 में तीसरी बार सत्ता हासिल करना है, जहां संगठन की मजबूती अहम होगी।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, खरमास से पहले फैसला हो सकता है, ताकि नए नेतृत्व में पंचायत चुनावों की रणनीति बने। वरिष्ठ नेता ने कहा, “2024 लोकसभा की हार से सबक लेते हुए संगठन को तुरंत मजबूत करना जरूरी है।”




